कवितासाहित्य

पहले की परंपरा की कुछ तो बात थी


          समझ नहीं आरा लिखूं कहा से..,
     की पहले की परंपरा की कुछ तो बात थ, 

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पहली रोटी गाय की आखिर कुत्ते की होती थी,
पहले हर गली में हर घर में ये परम्परा होती थी…,।

भूखा न तो इन्सान सोता था ना ही कुत्तों की रोने की आवाज होती थीं…,
उनके आवाज को अब दबा दिया जाता हैं..,।।

अपशगुण बोल के भगा दिया जाता है…,
कोई बताओ मुझे तुम्हारे साथ गलत क्या हुआ..??।

उनके रोने से तुम्हारे घर में क्या हुआ..??
क्यों तुम उनकी भूख को समझ नहीं पाते..,?? ।।

क्यों तुम उनको मार भागते??
गलती क्या उनकी उन्होंने ऐसा किया..??

भुख थी उनकी उनके रोने के पीछे…,!!
पर तुमने मार के सिवा उन्हें दिया क्या…,??

समझाओ मुझे तुमने ऐसा किया क्या….,??

पहली रोटी गाय की आखिर कुत्ते की होती थी,
पहले हर गली में हर घर में ये परम्परा होती थी…,।

( Note- अगर हर घर से पहली रोटी गाय और आखरी रोटी कुत्ते के लिए निकल दी जाए ना तो नाही कुत्ते भूखे सोएंगे ना ही इंसान..,
नही गाय भूखे रहेगी ना ही इन्सान,।

कई लोग बचे खाने फेक देते है अगर उस खाने को किसी भूखे या जानवर को खिला दोगे तो ना ही कोई भूखा रहेगा ना ही कोई खाने की चीज बर्बाद होगी ना फेकी जायेगी,।

इस बात को समझे ध्यान दे सोचे और हमेशा एक रोटी गाय और एक रोटी कुत्ते के लिए जरूर बनाएं,

साथ ही खाना उतना बनाए जितना बर्बाद ना हों,
कृपया बात की गहराई को समझे और ध्यान दे,

  • अंकिता द्विवेदी

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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