साहित्य

पाप के घड़ा

प्रिया देवांगन “प्रियू”

घड़ा पाप के भर जथे, बढ़थे अत्याचार।
दुःख दर्द मिलथे सदा, होथे ओकर  हार।।

करे जनम भर पाप जे, बुढ़त काल पछताय।
यज्ञ करे कतको जगह, तभो नरक मा जाय।।

माटी के जी घड़ा बने, जिनगी करम भराय।
ऊपर छलकय पाप जब, बेरा मा फटजाय।।

पाप पुण्य के लेख ला, करथे जी भगवान।
राम नाम के जाप से, बने नेक इंसान।।

पशु पक्षी ला मार के, जे मनखे हा खाय।
तड़प-तड़प के मर जथे, राक्षस योनी जाय।।

रचनाकार
प्रिया देवांगन “प्रियू”
पंडरिया
जिला – कबीरधाम
छत्तीसगढ़

Priyadewangan1997@gmail.com

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