साहित्य

” पिया बिन बरसे नैन “

उनकी मर्जीयों के हम गुलाम हो गए। क्या कहें उनकी चाहत के कैसे हम दिवाने हो गये।

जीना ” दुश्वार ” होता हैं जब आप मेरे करीब नहीं होते।कैसे बतायें नजरों को भी इंतजार रहता है पिया मिलन को ।

पिया बिन सजनी अधूरी लागे। पिया की चाहत से ही तो वो खिली-खिली लागे।

सोलह श्रृंगार भी उदास हो जाए अगर पिया ना हो तो
” पिया बिन बरसे नैन “

जितना इसे निकालना चाहूँ फ़िर भी निकलती नहीं जिस्मानी ख्वाहिश
दिल से

उठ रही जो मेरे अंदर तेज लहर हैं, हो रहा मेरे सपनों का उसमें विसर्जन है।

खौफ की साॅल ओढ़े बैठी है सजनी टिकटिकी लगाए राहों में ।

कोसती अपने भाग्य को क्यो भेजा परदेश हाय
अपने पिया को ।

दिन हो या रात ” पिया बिन बरसे नैन “
अब देर ना लगाओ “मोरे
पिया”

तुमसे मिलन को तरसते नैन ।
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लेखिका साहित्यकार कवियत्री निर्मला सिन्हा ग्राम जामरी डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ से ।

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