कवितासाहित्य

पीड़ा (कविता)

__अनुराधा प्रियदर्शिनी

हृदय पर कोई गर करे चोट
मन विदिर्ण पीड़ा होती तब
तन के घाव तो भर भी जाते
मन पर चोट कभीं ना भरती

अश्क मोती सम छलकें जब
मन के मैल वो धो कर जाते
सम्बन्धों का आधार भी पीड़ा
अपनों का आभास कराती

औरों की पीड़ा देख विचलित
जो जन हो जाया करता है
मानव गुण वो धारण करता है
जगत में श्रेष्ठ मानव बनता है

स्नेह लेप लगाकर दुःख हरता
पीड़ित को पीड़ा से मुक्ति देता
तन के संग उर आघातों को
अपने कोमल स्पर्श से भर देता

पीड़ा से भला क्यूं घबराना है
धैर्य का साथ संग में रखना है
सुख दुख तो आते जाते रहते
जैसे रात – दिवस बेला आती

अनुराधा प्रियदर्शिनी
प्रयागराज उत्तर प्रदेश
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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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