साहित्य

पुष्पलता की साहित्यकारा मैत्रेयी पुष्पा से एक मुलाकात

शिक्षित होने की परिभाषा समय और समाज के साथ राजनीति को समझना है: मैत्रेयी

साक्षात्कार साहित्यकार का

डाॅ पुष्पलता

मुजफ्फरनगर

वरिष्ठ रचनाकार जूनियर्स के रोल मॉडल होते हैं ।वे उनकी आलोचना करें या प्रशंसा उनका अनुसरण भी करते हैं। उनकी इच्छा होती है वे उनका मार्गदर्शन करें ।इसी भावना से डॉ पुष्पलता द्वारा लिया गया वरिष्ठ साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा का साहित्यकार प्रस्तुत है ।


1-डॉ पुष्पलता – क्या आपको लगता है कि अगर आप स्त्री के बजाय पुरुष रचनाकार होती तो और बेहतर कर पाती ?
-मैत्रेयी पुष्पा – नहीं , ऐसा नहीं है । हाँ स्त्री होने के नाते लोग हमारी उन पोस्ट्स पर भी सवाल उठाते हैं जो अगर किसी पुरुष की होतीं तो चुप रह जाते ।अक्सर ही स्त्री के साथ लिखित छेड़खानी करने में ज़्यादातर पुरुषों का मनोरंजन होता है ।मगर मुझे ऐसी प्रतिक्रियायें प्रभावित नहीं करतीं।
2 -स्त्रियाँ ही जब आपको विवादों में घसीटती हैं तो आप क्या सोचती हैं?

2 – जब स्त्रियाँ विरोध के लिये सामने आती हैं तो हँसी आती है और तरस भी आता है कि अभी तक हमारे शिक्षित समाज की स्त्रियाँ शिक्षित नहीं हुयीं ।वे डिग्री जैसे प्रमाणपत्रों को शिक्षित होने की गारंटी मान रही हैं जबकि शिक्षित होने की परिभाषा समय और समाज के साथ राजनीति को समझना है ।वे पढ़ी लिखी महिलायें अंधविश्वासों और कर्मकांडों में आपादमस्तक धंसी नज़र आती हैं । वे व्रत उपवासों के रास्ते रूढ़ियों का पोषण करती हैं और मेरे विरोध में खड़ी दिखाई देती हैं ।विवाद छेड़कर वे विजय भाव से सन्तुष्ट होती हैं ।अभी उनकी समझ परिपक्व नहीं हुयी ।उनको क्षमा कर देना ही अच्छा है ।
3 आप अपनी सबसे बेहतरीन कृति किसे समझती हैं?

3 – मैत्रेयी पुष्पा -लेखक से उसकी बेहतरीन कृति कैसे पूछी जा सकती है ? उसने तो पूरे मन मेहनत रचना की होती है । फिर भी जो पाठकों ने ज़्यादा से ज़्यादा पसन्द की है , वह ‘ चाक ‘ है ।
4 – डॉ पुष्पलता -क्या आप समझती हैं गॉड फादर के बिना साहित्य में शीर्ष पर पहुंचना मुमकिन नहीं ?

मैत्रेयी पुष्पा – यों तो हम गुरु बिन ज्ञान नहीं पाते , यह प्रचलित है और यह सत्य भी है ।लेखन की बात थोड़ी अलग है क्योंकि यहाँ व्यक्ति की प्रतिभा का ख़ासा योगदान रहता है ।गॉड फादर या गॉडमदर रचना के छपने छपाने तक मदद कर सकते हैं , लिखना तो लेखक को ही होता है और अनुभव भी लेखक के अपने होते हैं जो रचना की ज़मीन की तरह सामने आते हैं उस ज़मीन पर ही रचनाकार कलम चलाता है और अपने कौशल से एक नई दुनिया पाठक के सामने रखता है ।जब छोटी छोटी बातों से बड़ा संसार निर्मित होता है तब लेखक को लेखक माना जाता है । कोई किसी के बदले लिख नहीं सकता । हाँ घोस्ट राइटिंग का चलन भी साहित्य में है ।
5 -डॉ पुष्पलता -आप जूनियर्स को क्या संदेश देना चाहेंगी?
मैत्रेयी पुष्पा -जो ऊपर लिखा है वहीं मेरा संदेश है कि अपने अनुभव , अपना विजन और अपनी अलग लेखन शैली ही व्यक्ति को विश्वसनीय और ख्यातिलब्ध लेखक बनाती है ।
6- डॉ पुष्पलता -क्या आप सोचती हैं हिंदी साहित्य और साहित्यकार पतन की और अग्रसर हैं । क्या हिंदी साहित्य का भविष्य उज्ज्वल है?
मैत्रेयी पुष्पा -साहित्य और साहित्यकार पतन की ओर अग्रसर हों , ऐसी मैं कल्पना नहीं करती । यही सोचती हूँ कि हिन्दी साहित्य का भविष्य उज्जवल हो ।हिन्दी पढ़नेवाले बहुत हैं नहीं तो इतने हिन्दी अख़बार क्यों छपते ? रही बात साहित्य की तो वह भी अपने वजूद में क़ायम है नहीं तो इतने हिन्दी के प्रकाशक बाज़ार के बीच कैसे होते ? किताबों को भले पुस्तकालयों के लिये ख़रीदा जाये , पढ़ेंगे तो पाठक ही । कहानी साहित्य में हो या फ़िल्म में अथवा नाटक में वह साहित्य से ही निकलकर जाती है ।
7-डॉ पुष्पलता – क्या अगले जन्म में मैत्रेयी पुष्पा ही बनना चाहेंगी ?
मैत्रेयी पुष्पा – अभी तो यही इरादा है कि दूसरा जन्म होता हो तो मैत्रेयी पुष्पा के रूप में ही रहूँ बतौर लेखिका ।
8-डॉ पुष्पलता -स्त्री की सबसे बड़ी शक्ति क्या है?
मैत्रेयी पुष्पा – स्त्री की शक्ति है अपने निर्णय पर अडिग रहना । हमारा पुरुष समाज यह मानकर चलता है कि स्त्री उसके चलाये गये नियम क़ायदों पर चल रही है लेकिन यही तो पुरुष मानसिकता का सबसे बड़ा भ्रम है ।यह बात सच है कि स्त्री जो कर रही होती है वही सोच नहीं रही होती ।और जो सोच रही होती है वह कर नहीं होती । तभी तो स्त्री को माया कहा गया है ।जिन रिवाजों को वह निभा रही है , उन रिवाजों को उसका समर्थन प्राप्त नहीं ।ऐसा न होता तो कितनी ही स्त्री विरोधी मान्यतायें ख़त्म कैसे हो जातीं ? कितने ही राजावाड़ी मोहन राय होते स्त्री के इनकार के बिन सतीप्रथा ख़त्म नहीं होती । कितनी ही प्रथायें स्त्रियों पर बलपूर्वक लादी गयी हैं जो अब ख़त्म होरही हैं ।
9-डॉ पुष्पलता -क्या अतीत और वर्तमान के साहित्यकारों में कुछ विभिन्नताएँ पाती हैं।
मैत्रेयी पुष्पा – समय कभी एक सा नहीं रहता ।बदलाव तो मनुष्यगत प्रक्रिया है । माना कि सूरज और चन्द्रमा नहीं बदलते रात और दिन के दृश्य भी वहीं रहते हैं फिर भी प्रकृति में परिवर्तन होता है । हर बार वृष्टि एक सी नहीं होती और हर बार जाड़ा -गर्मी भी अपना भिन्न मिज़ाज लेकर आते हैं ।इसी तरह आदमी के रहन सहन में बदलाव आता है । जो सोलहवीं शताब्दी का आदमी था वह आज नहीं है । उसके स्वभाव से लेकर चालचलन में फ़र्क़ आया है , पहनावे से लेकर खानपान और रुचियों में परिवर्तन दिखाई देता है । साहित्य अपने वक्त का आईना होता है तो वहाँ भिन्नता तो मिलेगी ही ।आज का कवि न तो बिहारी की तरह लिखता है , न सुमित्रानन्दन पंत की तरह । लेखिकायें महादेवी वर्मा की तरह नहीं लिखतीं और न सुभद्रा कुमारी चौहान की तरह । ये सब उदाहरण हैं । तब से तो नदियों में पानी बहुत बह गया ।आज के लेखक विनोद कुमार शुक्ल हैं और कवि कृष्ण कल्पित ।नाम तो और भी लिये ज़ा सकते हैं ।इनकी भाषा आज की हिन्दी है और कविता अतुकांत । साहित्य का माहौल बिलकुल बदल चुका है ।
10-डॉ पुष्पलता –

  • मैत्रेयी पुष्पा -ग्रामीण पृष्ठभूमि से आना क्या है ? कोई विशेष बात तो नहीं ।साहित्य के इलाक़े गाँव को लाना है जो आज के समय में लगभग छोड़ सा दिया गया है ।पढ़ने लिखनेवाले आजकल गाँव में रहना नहीं चाहते । शहर की सुविधाएँ और चमक दमक आदमी को खींचती है ।साथ ही सुरक्षा की ज़रूरत पूरी होती दिखती है ।ऐसे में गाँव को विषय बनाकर लिखने वालों का अकाल है ।साहित्य किसी गाँव में झांक कर नहीं लिखा जा सकता और न ऐसा साहित्य बेहतर होता है ।यह रेणु और प्रेमचंद का जमाना नहीं कि लेखकों के डेरे गाँव में ही रहते थे ।हाँ जो वहीं रहते हैं , माहौल पर पूरी नज़र रहती है और उनकी कलम में रचने का हुनर है तो उनका ग्रामीण साहित्य श्रेष्ठ होता है ।गाँव के नाम पर कहानी उपन्यास लिख भर देना लेखक की अपनी कमी ही होती है ।
    11- डॉ पुष्पलता- -आजकल एकल माताओं की संख्या बढ़ रही हैं दाम्पत्य के विघटन के लिए क्या कारक जिम्मेदार हैं। मैत्रेयी पुष्पा – इन दिनों मैं शहर में हूँ, महानगर में । वैसे तो यहाँ के रहन सहन में किसी को किसी के बारे में कुछ ख़ास पता नहीं होता क्योंकि व्यक्तिगत बातें पूछना असभ्यता माना जाता है और सभ्य शहर में असभ्यता का तगमा गाली जैसा है । एक बार मेरे जैसी अनजान ने यह सवाल कर दिया कि सम्बंधों पर तोड़फोड़ ही क्यों ? कुछ मामले मोहब्बत से भी तो सुलझाये जा सकते हैं । इतना ही कहा था कि स्त्रियों ने ही मेरे ऊपर हमला बोल दिया । कहा कि मैं पितृसत्ता के पक्ष में बोल रही हूँ । स्त्री विमर्श को धूमिल कर रही हूँ ।शोर बहुत ज़ोर से उठा , इतना कि मेरा बोलना असम्भव सा होगया । मैंने माइक रख दिया । स्त्रियों का वह समूह मुझे बोलने नहीं दे रहा था । बाद में पता चला कि जहाँ मैं बोल रही थी वहाँ ज़्यादातर महिलायें एकल ज़िन्दगी में उतर चुकी हैं । मैं ने जो कहा उनकी नीति के विरुद्ध कहा ।वहाँ समझने और सुलझाने की बात बेमानी थी ।
    मुझे ताज्जुब हुआ कि यहाँ पढ़ी लिखी शिक्षित महिलाओं ने अकेले रहने का निर्णय क्यों लिया ? मुझे समझाया गया कि समय बदल गया है , अब पुरुष को उसकी औक़ात हर कदम पर बताई जाती है । स्त्री स्वतंत्र हुयी है तो ज़रूरी नहीं कि वह किसी की औरत बनकर रहे ! ‘ बच्चा ? ‘ मैंने पूछा तो जबाव आया कि बच्चे के कारण क्या किसी की ग़ुलामी करे ?
    मैं अज्ञान महानगर की स्त्रियों की स्वतंत्रता को नहीं समझ पा रही थी कि अब शादी कुछ दिनों के लिये ही होती है ? इसलिए ही मेरे आसपास ही तमाम एकल स्त्रियाँ निकल आईं । उनमें कुछ आर्थिक रूप से समर्थ थीं और कुछ समर्थ होने की कोशिश में थीं ।मैंने इस स्त्री शक्ति को सलाम किया । हमारे गाँव में औरतें अभी इतनी आगे नहीं बढ़ीं , कम्बख़्त बच्चे की ख़ातिर ही सम्बंध में रही आती हैं । ऐसा जिगरा कहाँ से लायें कि एकल ज़िन्दगी की आज़ादी को अपनाकर यहाँ से चल दें ।
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