कवितासाहित्य

पृथ्वी

__प्रीति चौधरी”मनोरमा”

1
पृथ्वी भरती आह है, सुनकर देखो शोर।
दे दो वसुधा के वसन, होगी सुखमय भोर।।

2
धरा आज है रो रही, बढ़ती जाती पीर।
देख भूमि की दुर्दशा, नयनों बहता नीर।।

3
हरित वसन सब छीनकर, किया मनुज ने पाप।
बढ़ता जाता नित्य ही, वसुधा का संताप।।

4
बने अवनि फिर से हरित, यही हमारा ध्येय।
सद्कर्मों का हे मनुज,मिलता सबको श्रेय।।

5
सुनो ध्यान से आज तुम, पृथ्वी की चीत्कार।
कैसे हँसकर सह रही,हम- तुम सबका भार।।

प्रीति चौधरी”मनोरमा”
जनपद बुलंदशहर
उत्तरप्रदेश

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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