साहित्य

प्यार,ममता व श्राप सब का महत्व है


डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव

प्यार व ममता जीवन में,ना हो तो सब है व्यर्थ।
दोनों से जो भरा हुआ है,मानव का तब है अर्थ।

ममता प्यार सभी में हो,वो नर हो चाहे हो नारी।
जिसमें ये भाव न होता,उसके बोल लगे कटारी।

प्यार से मीठा बोले जो,कभी न कोई काम रुके।
ममता के आगे तो जग में,बड़े बड़े हैं लोग झुके।

मात-पिता को काँवर में,कांधे ले श्रवण उठाया।
रस्ते में अंधे मात-पिता,प्यासे थे उन्होंने बताया।

प्यासे मात-पिता हेतु वह,जल लेने को है धाया।
श्रवण के जल भरने से आवाज है जलमें आया।

राजादशरथ शिकार पे,निकले थे करने शिकार।
आवाज से उन्हें लगा,पानी पीरहा हिरन शिकार।

जंगल के झुरमुट में इंसा को,देखे न नदी के तीर।
शिकार हेतु शब्दभेदी बाण,चलाये धनुष से तीर।

श्रवण गिरे छटपटा,राजा से बोले माँ-बाप प्यासे।
पानी पिला दें उन्हें,तड़प रहें होंगें वो दोनों प्यासे।

श्रवण इतना कहे एवं,हाथ से जल छूटा मौत हुई।
दशरथ कहें हे! राम ये क्या हुआ ? पश्चाताप हुई।

प्यासे को पानी पिलाने,जल लेके पहुँचे वहाँ पर।
जल उन्हें पिलाना चाहे,बूढ़ा पूछे श्रवण कहाँ पर।

दशरथ ने सच बात बताई,भूल हुईहै मुझसे भारी।
पुत्र शोक में जल पिए बिन,श्राप दिया उन्हें भारी।

पुत्र वियोग में जैसे मैं,अपना ये प्राण त्याग रहा हूँ।
तुमभी वैसे ही पुत्र वियोग में,मरोगे श्राप दे रहा हूँ।

कैकेई ने राजा से राम हेतु,वनवास को कहलाया।
वही श्राप फल दशरथ ने,राम वन जाने पर पाया।

हर मात-पिता के दिल में,सुत हेतु प्यार व ममता।
वैसा ही सुत-सुता में,रहती थी माँ-बाप से ममता।

अब में बात और है,अब तो प्यार ममता का लोप।
आज एक दूसरे में दिखती,दूरी और मन में क्षोभ।

समय बदल गया,परिस्थितियां भी कितनी बदलीं।
मात-पिता की नहीं है इज्जत,पुत्र-बहू सब बदलीं।

रचयिता :
डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पी बी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.
(शिक्षक,कवि,लेखक,समीक्षक एवं समाजसेवी)
सम्पर्क : 9415350596

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