साहित्य

प्यार तो प्यारा होता ही है

श्रीकांत यादव

वह फूल ही क्या जिसमें,
अपनी खुद की महक न हो।
उस दर्द का अहसास क्या,
जिसमें कुछ अहक न हो।

मित्रता वह कैसी जिसमें,
हर राज की भनक न हो।
दुख की न हो परवाह,
मर मिटने की सनक न हो।

काम कहो किस मतलब का,
फल ही संतोषजनक न हो।
उसे करने का मजा ही क्या,
जब कुछ उत्साहजनक न हो।

उस व्यक्ति से मिलना ही क्या,
चेहरे पर जिसके रौनक न हो।
दिलदार किसी को तब मानो,
मिले से खिले भौचक न हो।

खुश होना क्या यह होना है,
उसमें बसी ठसक न हो।
प्यार तो प्यारा होता ही है,
उसमें लेकिन बहक न हो।

बेमतलब जैसी वह जिंदगी,
जिसमें खुशी की चहक न हो।
वह ज्ञान भला किस काम का,
जिससे मिलती सबक न हो।

वह चाल कहां मतवाली है,
चलने पर जहां लहक न हो।
यदुवंशी वह आग ही क्या,
पूरी भरी जब दहक न हो।

वह पथरीली चिंगारी क्या,
वहां कोई चकमक न हो।
जलेंगे तो शोले ही कैसे,
रहता कोई अहमक न हो।

श्रीकांत यादव
(प्रवक्ता हिंदी)
आर सी 326, दीपक विहार
खोड़ा, गाजियाबाद
उ०प्र०!

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