साहित्य

प्रकृति :एक शिक्षक के रूप में

     प्रकृति और मनुष्य का बहुत गहरा संबंध है। मानव ने जब अपनी आंखें खोली तो प्रकृति को ही अपने समीप पाया। प्रकृति मनुष्य की प्रेरणा शक्ति है। वह जननी की भाँति मनुष्य को दुलराती है, संस्कारवान बनाती है और पिता की तरह उसका पालन-पोषण भी करती है। प्रकृति के माध्यम से मानव समाज ने जितना ज्ञान और जितनी शिक्षा हासिल की है उसकी तो कोई सीमा ही नहीं है, उसका तो कोई विराम और अंत ही नहीं है। विजयदान देथा के शब्दों में – “प्रकृति मनुष्य की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी है। इस यूनिवर्सिटी ने मनुष्य से कितना सीखा है कितना सीखता चला जा रहा है और कितना सीखेगा – इसका न तो कोई पार है और न इसकी कोई सीमान्त रेखा ही।”
      धर्म, दर्शन, कला, साहित्य और जीवन सभी में प्रकृति का स्थान वरेण्य है। साहित्य में प्रकृति की उपादेयता अक्षुण्ण है यही कारण है कि साहित्य का आविर्भाव ही प्रकृति के माध्यम से हुआ है –
      मा निषाद ! प्रतिष्ठां त्वगम: शाश्वती समा:।
       यत्क्रोच्योंमिथुनादेकमवधी: काम मोहितम्॥

   मनुष्य के जन्म से भी पहले से उसकी गुरु है प्रकृति।वह अनगिनत आंखें हाथों और मन से मनुष्य को कुछ ना कुछ सिखाती ही चली आ रही है। वह गुरु होने के साथ मां और बाप भी है। वह रक्षक और न्यायाधीश भी है। वह गति और विकास का व्याकरण सिखाती है। उसे छेड़ा तो विनाश का सबक भी सिखाती है। प्रकृति हमारी गुरु है ।हमें पंच रूपों में शिक्षित करती है। मैथिलीशरण गुप्त की जी ने भी अपनी कविता में लिखा है-
” जल तुल्य निरंतर शुद्ध रहो
प्रबलानल ज्यों अनिरुद्ध रहो ,
पवनोपम सत्कृतशील रहो ।
अवनी तलवत धृतशील रहो ।
कर लो नभ सा शुचि जीवन को,
नर हो न निराश करो मन को।”

जल के रूप में प्रकृति हमें सिखाती है बहना ।
जल के रूप में प्रकृति प्रगति और प्रवाह का ककहरा सिखाती है। पानी बताता है कि हमें हर बाधा को पार करते हुए चलना है जैसे नदी चलती है पत्थरों ,अवरोधों में कभी रुक कर ,कभी सकुचा कर तो कभी विराट रूप धारण कर, कभी सीधी तो कभी राह बदल कर।
      जल ही जीवन है जीवन का पर्याय है। ठीक उसी तरह जिस तरह ज्ञान सभ्यता का पर्याय है।
     वायु के रूप में प्रकृति देती है सीख सीमाओं में रहकर जीने की ताकि चलता रहे जीवन ना हो कोई अनर्थ वायु। वायु का अर्थ वेग भी है। यह गुरु जब अपनी सीमा तोड़ती है तो आंधी बन जाती है। मनुष्य जब सीमा तोड़ता है तो जीवन में भूचाल आ जाता है ।
 
     पृथ्वी अपनी तरह धैर्य रखना और दृढ़ता की शिक्षा देती है। पंचमहाभूतों में से एक पृथ्वी के बारे में कहा गया है कि-
  हमारे शरीर में जितना ठोस हिस्सा है वह पृथ्वी है ।पृथ्वी सीख देती है कि डटे रहो। धैर्य मत त्यागो। स्थिर रहना पृथ्वी का गुण है। अपने लक्ष्य और निर्णय पर अडिग रहने का गुण सफल व्यक्तित्व का आधार है।
 
        आग हमें सिखाती है ऊर्जा का सही उपयोग करना और अति उत्साही ना होना। आग यानि ऊर्जा। आग का पैमाना बिगड़ा तो दावानल होता है ।इसी तरह किसी भी कार्य में अति उत्साह या ज्यादा ऊर्जा लगाता उस काम को बिगाड़ देता है। खाना बनाने के लिए ऊर्जा की मात्रा भी अलग-अलग होती है । इसी तरह हमें आग हमें सिखाती है कि कहां कहां कितनी उर्जा निवेश करनी है।

     आकाश सिखाता है खुलकर उड़ना। लेकिन कभी न भटकना ।आकाश का अर्थ है विस्तार । जीवन को आसमान जितना विस्तार देना संभव है। यही उम्मीद हमें आकाश को देखकर मिलती है। विज्ञान कहता है कि  ग्रह गुरुत्वाकर्षण बल के कारण एक नियम से बंधे हुए हैं। इसी तरह आकाश जिसने विस्तार पाते हुए हम भटक ना जाएं इसलिए जरूरी है कि हम अपने उद्देश्य को ना भूलें।

           रामचरित मानस के अरण्य कांड में भी गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी प्रकृति को एक शिक्षक के रूप में चित्रित किया है।
      संस्कृत के किसी कवि ने लिखा है –

    पिबन्ति नद्यः स्वयम् एव न अम्भः
   स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः।
    न अदन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः
     पर-उपकाराय सतां विभूतयः॥

     जैसे नदियां पानी खुद नहीं पीती है। पेड़ फल खुद नहीं खाते हैं। बादल भी फसल नहीं खाते हैं। उसी प्रकार सज्जनों की संपत्ति परोपकार के लिए होती है।

प्रकृति का हर तत्व बहुत उपयोगी है और यह हमें किसी न किसी तरह सिखाता है। पेड़, सूरज, चाँद, फूल, बारिश, पहाड़, खेत, नदियाँ सभी प्रकृति में शामिल हैं,यह प्रकृति के महत्वपूर्ण घटक हैं। प्रकृति हमें दूसरों से अपेक्षा किए बिना उनकी मदद करना सिखाता है। … इस प्रकार, प्रकृति हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ गुरु है।
  
       प्रकृति हमारी वास्तविक माँ की तरह की होती है जो हमें कभी नुकसान नहीं पहुँचाती बल्कि हमारा पालन-पोषण करती है। सुबह जल्दी प्रकृति के गोद में टहलने से हम स्वस्थ और मजबूत बनते हैं।
       प्रकृति हमें परिवर्तनशील रहने की भी प्रेरणा देती है।दिन और रात बारी बारी आते हैं।इसी तरह सुख -दुख भी आते -जाते रहते हैं।रात-दिन का क्रम से आना हमें यह सिखाता है कि बदलती परिस्थितियों से घबराएं नहीं।कुछ टिक कर नहीं रहने वाला।
   
        जयशंकर प्रसाद जी ने भी लिखा है कि-
             “प्रकृति के यौवन का शृंगार
              करेंगे कभी न बासी फूल।”
वह कहना चाहते हैं कि प्रकृति को सौंदर्य ताज़े फूल ही प्रदान करते हैं अर्थात फूल की तरह सदैव स्वयं को ताज़ा रखें अर्थात ख़ुद में बदलाव लाते रहें।पुरानी मान्यताओं को त्याग कर नए रूप को स्वीकार करते रहें।

           इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रकृति हमें एक गुरु के रूप हर तरह की शिक्षा देती है जो हमारे जीवन को मूल्यवान बनाने में सहायक है।

          इंदु मिश्रा’किरण’
       कवयित्री ,लेखिका, ग़ज़लगो,शिक्षिका
             नई दिल्ली

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