साहित्य

प्रकृति

हाइकू

अलका गुप्ता ‘प्रियदर्शिनी’

रूप अनूप
प्रकृति का सौंदर्य
छटा सुखद।

गहरी नदी
अथाह सा सागर
कूप तडाग।

गिरे पर्वत
झरने झर झर
शुभ सुंदर।

सुमन खिले
उपवन की क्यारी
भौंरे गुंजत।

शीतल वायु
बहती मंद मंद
सु सुगंधित।

पंच तत्वों का
समाहार प्रकृति
संगठित है।

जल पावक
गगन व समीरा
क्षिति गर्बीली।

पशु पक्षी है
अनगिनत रूप
चर अचर।

ऋतुएं छह
बदलती प्रकृति
मनमोहक।

ऋतु बसंत
है सबसे सुंदर
सरसों फूली।

सुंदर रूप
प्रकृति मनोहर
रक्षण चाहे।

अलका गुप्ता ‘प्रियदर्शिनी’
लखनऊ उत्तर प्रदेश।
स्वरचित मौलिक व अप्रकाशित
@सर्वाधिकार सुरक्षित।

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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