कवितासाहित्य

प्रतीक्षा

__कात्यायनी कदम

जबतक तुम लौटोगे
झुकी हुई पीठ से
अपनों के मान का,
बहनों के सुन्दर संसार का,
माँ-बाबूजी के अनचूकते ऋण का,
जन्म से कंधे पर रखे गए
जिम्मेदारियों का
और
समाज की आलोचनाओं का
बोझ उतारकर,
तबतक वो सो चुकी होगी,
खो चुकी होगी
तुम्हारे सपनों में,
वो नहीं उठेगी,
वो इस तरह खुद को
तुम्हारे साथ जिएगी
कि तुम्हारे सशरीर होने की
शायद कोई खुशी नहीं होगी,
तुम उसके सिरहाने बैठे रहोगे,
उसकी पेशानी चूमते रहोगे,
कई-कई धाराएँ बहाओगे
जो छींटे बनकर
पड़ेगी उसकी पलकों पर,
लेकिन वो नहीं उठेगी,
तुम्हारे रोने से
पृथ्वी का वक्ष फट जाएगा
और कड़कती बिजली
उसमें समा जाएगी,
फिर भी वो सोती रहेगी
और तुम अनगिनत युगों तक
उसके सिरहाने जागोगे,
और एक दिन हारकर
अपने ही हाथों से
फूँक दोगे
“उसको”
भटकते रहोगे उसके
दोबारा लौट आने की प्रतीक्षा में
दशाहीन, दिशाहीन, जीवनहीन
लेकिन वो नहीं लौटेगी
उसे स्वीकार नहीं होगा
फिर से फूँका जाना।

कात्यायनी कदम

100% LikesVS
0% Dislikes

Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!