कवितासाहित्य

प्रेम

__संगीता श्री वास्तवा

प्रेम की सत्ता बहुत बड़ी है
बड़ी से बड़ी दीवार ढही है।

प्रेम है सागर का मोती,
प्रेय है आखों की ज्योति,
प्रेम आखों से लुढ़कती बूंद,
प्रेम सीने मे उठती हूंक।

प्रेम एक बहती धारा है,
जिसमें पग पगजीवन संवरा है,
टिकी है प्रेम,लिहाज पे दुनिया
वरना कौन किससे अबरा है।

आओ प्रेम के पौध लगाएं,
सघन जो होगें इनके साये,
महक उठेगा चमन हमारा,
चलो दिलों के भेद मिटाएं।

संगीता श्री वास्तवा 

वाराणसी यूपी।

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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