साहित्य

प्रेम

अनिता मंदिलवार “सपना”

सजनी करती प्रेम से, साजन से मनुहार ।
आ जाओ इस बार तुम, है तुमसे बस प्यार ।।
है तुमसे बस प्यार, नहीं कोई और दूजा ।
तुम रहो खुशहाल, करती हूं नित पूजा ।।
सपना कहती आज, मौन रहे है रजनी ।
साजन रहता पास, तभी खुश रहती सजनी ।।1

पाती भेजो स्नेह से, प्रेम भरे दो बोल ।
गाएँ मंगल गान भी, मन आँखो को खोल ।।
मन आँखो को खोल, सरलता इसमें पाया ।
करते क्यों कुछ झोल, मीत बनकर साया ।।
सपना है समझाय, साँस तो आती जाती ।
प्रियतम है जो दूर, स्नेह से भेजो पाती ।।2

इतना ही बस प्रेम हो, करले मुझसे बात।
बिन लालच इस बात को, समझे मन सौगात।
समझे मन सौगात, अदाएं देख निराली।
अर्पित उसको आज, करे अधरों की लाली।
सपना से ले जाग, भला दिखता क्या कितना।
ओझल सब व्यवहार, किया था उसने इतना। 3

अनिता मंदिलवार “सपना”

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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