साहित्य

उठो मुसाफिर तुमको अपनी मंज़िल भी तो पाना है

उठो मुसाफिर तुमको अपनी मंज़िल भी तो पाना है
थक कर यूँ क्यों बैठ गये हो तुम्हे दूर तक जाँना है

उठो मुसाफिर तुमको अपनी मंज़िल भी तो पाना है
थक कर यूँ क्यों बैठ गये हो तुम्हे दूर तक जाँना है

उठो मुसाफिर तुमको अपनी मंज़िल भी तो पाना है
थक कर यूँ क्यों बैठ गये हो तुम्हे दूर तक जाँना है

रोंनी सूरत बना रखी है मुखड़े पर है छाई उदासी
माना कि पतझड़ का मौसम है चहुँ और है मायूसी
लेकिन इसके बाद में राही फ़िर बसंत भी आना है
थक कर यूँ क्यों बैठ गये हो तुम्हे दूर तक जाँना है

अभी तो है यहाँ गहन अँधेरा कुछ भी नहीं सुझाता है
ना रस्ता ना मंज़िल का पता है कुछ भी नज़र ना आता है
अंधकार की नीरवता में तुमको इक दीप जलाना है

थक कर यूँ क्यों बैठ गये हो तुम्हे दूर तक जाँना है
उठो मुसाफ़िर तुमको अपनी मंज़िल भी तो पाना है

माना जग है एक सराय सबको इक दिन जाँना होगा
जब तक यहाँ पर रहना है यहाँ का धर्म निभाना होगा
जब जाँना होगा चले जाएंगे अभी से क्या घबराना है
थक कर यूँ क्यों बैठ गये हो तुम्हे दूर तक जाँना है

तेरे पदचिन्हों पर चल कर और लोग भी आएंगे
इसी राह पर चल कर के मंज़िल को पा जाएंगे
तुमको उनके पथ में पारस प्रेम के फ़ूल खिलाना है

उठो मुसाफ़िर तुमको अपनी मंज़िल भी तो पाना है
थक कर यूँ क्यों बैठ गये हो तुम्हे दूर तक जाँना है

डॉ रमेश कटारिया पारस

30,कटारिया कुञ्ज गंगा विहार महल

गाँव ग्वालियर म .प्र .474002
9329478477

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