साहित्य

फिर महके हर सिंगार


‘क’ और ‘ख’ एक ही गाँव के, एक ही  मुहल्ले  की, एक ही  गली में, आस- पास रहते थे। दोनों  के परिवारों में  भाईचारा  था। ‘क’ के  पिता स्कूल मास्टर  थे, ‘ख’ के  पिता की छोटी  सी किराने की दुकान थी। ‘क’ और ‘ख’, दोनों  साथ- साथ पढ़े। ‘क’ पढ़ने  में अव्वल और ‘ख’ फिसड्डी। आठवीं  में  फेल होने के बाद  ‘ख’ ने  पढाई   छोड़  दी और ‘क’ ने बड़ी- बडी  डिग्रियाँ  हासिल कीं और पाई एक शानदार  नौकरी। वह सपरिवार  शहर  शिफ्ट हो  गया। वह एक ईमानदार, कर्तव्य- निष्ठ अधिकारी  था। अपने सादगी भरे जीवन  से संतुष्ट  था।
उस दिन दफ्तर में स्वतंत्रता -दिवस  का कार्यक्रम  था। जाने कोई तो नेताजी झंडा-रोहण के लिए आने  वाले  थे। ‘क’ सारी जिम्मेदारियाँ संभाल रहा था। नियत समय पर नेता आया, ‘क’ ने उसका अभिनंदन किया तो दोनों  की नजरें  टकराईं। ‘क’ ने  हैरानी  से देखा, यह ‘ख’ था।  दोनों  की नजरों में  पहचान  उभरी और खो गई। कार्यक्रम  सुचारू रूप  से  संपन्न हो गया। शाम को ‘ख’ का फोन आया, मित्र ‘ख’ का। एक अनौपचारिक  सी बातचीत  हुई। बाल- बच्चों  की कुशल- मंगल पूछी गई। ‘क’ को लगा, उसका बिछुड़ा दोस्त उसे  मिल गया। ‘ख’ ने  उसे  अपने ही पास  बुला लिया। अब ‘ख’ बास था, ‘क’ मातहत। ‘ख ‘ जो कहता,उसे करना पड़ता, जहाँ  जाता, उसे  जाना पड़ता। ‘ख’ को घूमने – फिरने का, खाने- पीने  का शौक था। रोज नए- नए प्रोग्राम  होते। ‘ख’ बुलाए, बिन बुलाए जाता। इसे भी  जाना पड़ता। ‘ख’  जहाँ जाता, खूब खाता और  छोड़ता। वातावरण गंधाता। 
      बात फैलती , तो ‘ख’ ”क’ पर इसका  आरोप लगाता।  कई बार  तो  सबके सामने ही कहता, ” भई, इतना  खाते क्यों  हो, जो पचा नहीं पाते।” ‘क’ अपमान  का घूँट  पीकर रह जाता।  लोग सही एरिया  लोकेट कर मुँह छिपाकर मन ही मन हँसते, कुछ की नजरों में’ क’ के प्रति  संवेदना भी उभरती। कुछ ‘क’ की बेवकूफी पर तंज कसते। ‘ख’ भी भली -भाँति जानता था कि सब उसकी सच्चाई को जानते थे।  पर बिल्ली की क्या मजाल, कि शेर के  सामने म्याऊँ  करे। धीरे- धीरे  वातावरण और भी दुर्गंध पूर्ण हो गया  था। ‘अब ‘क’ ‘ख’ से और  ‘ख’  ‘क ‘से छुटकारा चाहते  थे।
आखिरकार ‘क’ ने  पहल की, तबादले के लिए अर्जी  दी, और उसका तबादला एक पिछडे़ इलाके  में हो गया। दुर्गंध  से छुटकारा पा ‘क’ खुश था, लेकिन  उसका परिवार  बेहद नाखुश। सुख -सुविधाओं से रहित  यहाँ के वातावरण में उनकी  साँस घुटने  लगी। वे भी खाना पीना चाहते थे।नॉर्मल जिंदगी जीना चाहते थे। ‘क’ की बातें  उन्हें  कतई पसंद नहीं थीं। क्लेश  बढ़ने लगे। उसके लाख मनाने -समझाने पर भी उसकी पत्नी,बच्चों को लेकर अपने पिता के यहाँ शहर चली गई।
   ‘क’ अपने आदर्शों और उसूलों के साथ अकेला रह गया।  दफ्तर और घर के कामों से थककर चूर रहता। ऊपर से उसने वातावरण को महकाने का दायित्व भी स्वेच्छा से संभाल लिया था। इलाके के  बच्चों  की पढ़ाई,और सफाई की  फिक्र करता, पौधे लगाता। उसे किसी से कोई शिकायत नहीं थी। वह अपनी इस दुनिया में बहुत  खुश  था। ‘ख ‘वाली  दुर्गंध से उसका पीछा छूट गया था। उसके आसपास अब सुगंध थी। न जाने  कितने  हरसिंगार उसके  आस पास महकते, लेकिन स्वास्थ्य के प्रति उसकी उपेक्षा उसके लिए घातक सिद्ध हुई  और  उसने बिस्तर पकड़ लिया। यहाँ एक अधेड़ उम्र का माली था जो  उसके पास ही रहता। उसके छोटे- मोटे कामों में उसकी सहायता करता। पास- पडोस के लोग भी कुशल समाचार पूछने आ जाते।लेकिन यह सब काफी नहीं था। इलाके में चिकित्सा की व्यवस्था भी लचर थी। एक दिन माली ने ही कहा ,”बाबूजी,मेम साहब को बुला लीजिए।शहर जाकर इलाज करवा लो,तो ठीक हो जाएंगे।” यह नहीं माना और किन्हीं भावुक पलों में माली को अपने शहर छोड़ने की सारी कथा सुनाई। माली भी सीधा सादा आदमी था। फिर कभी यह बात नहीं उठाई। हाँ ,बेचारे ने अपनी ओर से सेवा-जतन में कोई कसर नहीं छोडी। ‘क ‘अक्सर कहता ,” जब तक मेरी खुशबू मेरे पास है, मुझे कोई दुःख नहीं है। अब मैं मर भी जाऊं ,तो भी कोई बात नहीं। हां,तुम इस खुशबू को बचाना। बचाओगे न?”  ‘क’ माली की ओर आशा भरी नज़रों से देखता। माली उसका मन रखने के लिए सिर हिलाता और फिर सबसे
पूछता,बाबू जी किस खुशबू को बचाने को कह रहे हैं। किसी को इस बाबत कुछ पता नहीं था।
        
        और  एक दिन ‘क’  चल बसा। इलाके के लोग उससे बहुत प्यार करते थे।उसकी याद में उन्होंने हरसिंगार के पेडों के पास उसकी एक प्रतिमा लगवाने की  सोची। प्रतिमा लग गई। प्रतिमा का उद्घाटन  कौन करे? इस पर विचार  होने लगा। कुछ ने ‘ख’ का नाम सुझाया। कहा — ‘ख’,’ क’ का लंगोटिया यार है। इस काम के लिए वह बिल्कुल सही रहेगा। सबने ,यह बात मान ली। नियत समय पर ‘ख ‘ आया, और उसके साथ आई गंध से  वातावरण गंधाने लगा। यह वही चिर-परिचित गंध थी, जिससे बचने के लिए ‘क’ ने  हर सिंगार उगाए थे, वह दुर्गंध, जो केवल उसी  को  आती थी । बाकी लोग तो न केवल इसके अभ्यस्त थे ,बल्कि इसका हिस्सा बनने को कुछ भी कर सकते थे। समारोह  प्रारंभ  हुआ।  प्रतिमा का अनावरण हुआ।  ‘ख’ मूर्ति पर हार चढ़ाने लगा तो  सब यह देख हैरान हो गए  कि मूर्ति की आंँखों  में आंँसू भरे थे । ‘ख’ इन आंँसुओं का राज बखूबी जानता था,पर क्या कहता । अभिनय का कमाल दिखाते हुए  ‘क’ की ईमान दारी और कर्मठता पर भाव विह्वल होकर भाषण दिया । श्रद्धा पूर्वक प्रतिमा को प्रणाम  किया।।उपस्थित जन समुदाय ‘क’ और ‘ख’ की मित्रता में कृष्ण-सुदामा की  झलक देख रहे थे। लेकिन माली देख रहा था,बाबूजी के हरसिंगार को मुरझाते हुए। “मेरी खुशबू को बचाना,बचाओगे न,वचन दो” बाबूजी ने जो कहा था, अब उसे सब समझ आ गया था।

             समारोह समाप्ति पर था।फोटो खींचे जाने लगे। एक दो मीडिया वाले भी सुर्खियाँ बटोरने आ गए थे। ‘ख’  की चापलूसी में मग्न थे। ‘ख’  बेहद संतुष्ट था।  खा-पीकर ,लोगों को ‘क’ जैसा बनने की नसीहत देकर ‘ख’  गाडी में बैठा ही था ,कि उसके होश- हवास  उड़ गए । माली की अगवानी में,एक पूरी भीड़ उसकी ओर बढ़ रही थी। ” दूर भगाओ इसे,मारो इसे। इसने बाबूजी की खुशबू  को मारा है। देखो,  बाबू के हर सिंगार मुरझा रहे हैं। भगाओ इसे यहाँ से—–।”लोग चिल्लाते हुए उसी की ओर बढ़ रहे थे।   ‘ख-‘सारा माज़रा  समझ गया  और  बचने के लिए जी जान से भागने लगा । बेतहाशा भीड़ उसके पीछे थी। “हम  खुशबू को मरने नहीं देंगे।” वातावरण गुंजित अनुगुंजित था।  हरसिंगार  एक बार फिर महकने लगे थे।

वीणा गुप्त
नई दिल्ली

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