कवितासाहित्य

बड़ी मुश्किल से मिलता है

नीतू नन्द किशोर मौर्या

जिसे हम कह सके अपना बड़ी मुश्किल से मिलता है!
पतझड़ में हरा पत्ता बड़ी मुश्किल से मिलता है।

हम अपने खून के रिश्ते पर यूं तो बड़ा नाज करते हैं!
मगर रिश्ता मुरव्वत का बड़ी मुश्किल से मिलता है।

जरा सी बदगुमानी पर दिलों को तोड़ते हैं सब!
दिलों को जोड़ने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है।

उदासी के इस आलम में मधुर मुस्कान ढूंढने वालों!
यह हंसता हुआ चेहरा बड़ी मुश्किल से मिलता है।

तमन्ना सब ही करते हैं ऊंचाइयों  पर पहुंचने की!
किसी को ऊंचा स्थान बड़ी मुश्किल से मिलता है।

भटक जाता है मंजिल से मुसाफिर चलते-चलते जब!
पता फिर उसको मंजिल का बड़ी मुश्किल से मिलता है।

बंद स्थानों पर दिए जलते तो देखे हैं बहुत लेकिन!
हवाओं में दिया जलता बड़ी मुश्किल से भी मिलता है।

खुशी में तो बहुत हमराज मिल जाते हैं ए दिल!
गमों को बांटने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है।

नीतू नंदकिशोर मौर्या
शहाबपुर,बाराबंकी

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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