साहित्य

बन्दिशें



पूर्वाकी शादी को अभी 6 महीने ही हुये थे पर उसके चेहरे की रौनक और हंसी पता न कहां चली गयी । एक उन्मुक्त चंचल हिरणी की स्वतंत्रता पर जैसे अंकुश लगा दिया हो ससुराल में उसके हंसने बोलने सब पर बन्दिशे लग गयी ।
एक महीना तो घूमने फिरने में निकल गया पर उसके बाद हुअा बन्दिशों का दौर शुरु । आज देव पूजा है तो कभी पति दीर्घायु का व्रत है। कभी उसको सर पर पल्लू रखने को टोका जाता तो कभी मांग भरने पर । जींस टाप तो उसके लिये स्वप्न हो गये । आफिस जाना है तो साड़ी पहनो और बाहर निकल कर जाओ तो सर पर पल्लू रख कर ।
पूर्वा समझ नहीं पा रही थी कि कैसे ताल मेल बैठाये वह पूरी कोशिश करती थी कि उससे कोई गलती ना हो जिससे कोई टोके । पति अखिल भी उसकी भावनाओं को नहीं समझ पा रहा था । बहुत ही पुराने विचारों के लोग थे । अचानक उसकी ननद ऋतु अपने मायके आगयी जिसकी शादी भी कुछ दिन पहले हुई थी सब परिवार के सदस्य ऋतु से पूछ रहे थे और वह रो रो कर बता रही थी कि ससुराल में वह नहीं रह सकती क्योंकि वहां उसकी सारी स्वतन्त्रता पर रोक है। पूर्वा ऋतु को समझा रही थी दीदी सब को नये परिवेश में ढालना होता है। जब उसकी सास ने कहा कि ऋतु वहां नहीं जायेगी अगर उसको ढंग से नहीं रखेगे । थोड़ी देर बाद पूर्वा भी अपना सूटकेस लेकर जाने लगी सब उसको रोकने लगे । पूर्वा बोली ये बन्दिश मै ही क्यों सहन करू । मैं क्यों इस पिंजरे में बन्द रहूं । क्या आप सबने कभी सोचा कि मै भी तो अपने परिवार की लाड़ली बेटी थी । एक नौकरी पेशा बेटी मुझे भी तो एक तरह से कैद कर दिया गया है। पूरे परिवार में सन्नाटा छा गया ‌।
स्वरचित
डा.मधु आंधीवाल
अलीगढ़

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