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बिखर गई पंचायतें

डॉ सत्यवान ‘सौरभ’

गाँव-गाँव अब रो रहा, गांधी का स्वराज।
भंग पड़ी पंचायतें, रुके हुए सब काज।।

कहाँ बचे भगवान से, पंचायत के पंच।
झूठा निर्णय दे रहे, ‘सौरभ’ अब सरपंच।।

पंचायत के आज कल, बदल गए है पक्ष।
दाँव पेंच में उलझते, पंच के संग अध्यक्ष।।

पंचायत विषधर करे, हुई बहस पुरजोर।
हम से विष में आदमी, क्यों आगे हर ओर।।

रही नहीं पंचायतें, रहे नहीं वो गाँव।
फँसकर कोर्ट कचहरियां, घिस-घिस जाते पाँव।।

न्याय रूप भगवान का, चलता इनसे राज।
पंचायत हो सच अगर, बनते सबके काज।।

पंच राम का रूप थे, राम राज चहुँ ओर।
कहाँ गया वो राज अब, कहाँ सुनहरी भोर।।

जनहित करें न काम जो, वो कैसे सरपंच।
चढ़ना उनका पाप है, पंचायत के मंच।।

बिखर गई पंचायतें, रूठ गए है पंच।
भटक राह से है गए, स्वशासन के मंच।।

(सत्यवान ‘सौरभ’ के चर्चित दोहा संग्रह ‘तितली है खामोश’ से। )

डॉ सत्यवान ‘सौरभ’

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कुमार संदीप

अध्यापक सह लेखक । निवास स्थान- सिमरा(मुजफ्फरपुर) बिहार । विभिन्न साहित्यक पत्र पत्रिकाओं में निरंतर रचना प्रकाशन । कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित । वर्तमान में ग्रामीण परिवेश में अध्यापन कार्य सहित दि ग्राम टुडे मासिक व साप्ताहिक ई पत्रिका के अलंकरण का कार्य।

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