कवितासाहित्य

बिन बेटी सूना घर आंगन

__मणि बेन द्विवेदी
वाराणसी

जब बेटी भ्रूण में मारोगे, कैसे रिश्तों का विस्तार होगा?
जो सृजन हार है सृष्टि का जब उसका ही सॅंहार होगा।
बेटी बाबुल के बगिया की कोयलिया सी होती है।
उछल कूद करती है इत उत छैल छबीली होती है।

गर बेटी ना होगी फिर तो पायल की रुनझुन का क्या?
तीज़ और त्योहारों में फिर गीतों के गुनगुन का क्या?
बेटी के पग घूॅंघर के बिन आंगन कैसे शोभेगा?
निमिया के बीरवा पर कैसे भौरा कोई गूॅंजेगा?

चह चह चहकेगी फिर कैसे गौरैया सी बेटी बाग में?
कन्यादान का फल कैसे मिल सके पिता के भाग में?

बेटी से सभ्यता है पोषित बेटी से निर्मित सॅंस्कार।
बेटी बिन हर रौनक फीका बेटी से सुरभित सॅंसार।
बेटी ही तो दो दो कुल की आन मान औ शान बढ़ाती।
बेटी ही होती है माॅं के दुख सुख घड़ी की साझे दार।

बिन बेटी के सूना आंगन सूना लागे निमिया डार।
नहीं लाडली जिसके घर में उजड़ा लागे आंगन द्वार।
कोख ना माॅं का होत सार्थक एक बेटी ना जन्मे जब।
कल की बेटी आज भविष्य है बेटी ही है सृजन हार।

मणि बेन द्विवेदी
वाराणसी

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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