साहित्य

बीच का आदमी

डा0विनोद तिवारी

मैं बीच का आदमी हूं!

मेरे हिस्से में
न धरती है,न आकाश,,
मेरे किस्से में
न प्रगति है, न विकास,,,!!

मैं बीच का आदमी हूँ!

इसलिए
न कोई आरक्षण है,न सरंक्षण,,
मेरे लिए
न कोई आवंटन है,न संघठन,,!!

मैं बीच का आदमी हूँ!

लोक और तंत्र के बीच
मैं लटका हूँ-
त्रिशंकु की तरह,,!

संवैधानिक अनुच्छेदों के बीच
मैं अंटका हूँ-
सांप-छुछुंदर की तरह,,!!

मैं बीच का आदमी हूँ!

न घर का हूँ
न घाट का हूँ
मैं धोबी का कुत्ता हूँ,,!

इस गली से
उस गद्दी तक जाने में,
मैं तेरे पैर का जूता हूँ,,,!!

मैं बीच का आदमी हूं,,,!!


डा0विनोद तिवारी,

मोतिहारी पू चंपारण(बिहार)9934248056

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