लघु कथासाहित्य

बुद्धु


__भुवनेश्वर चौरसिया “भुनेश”

ठीक दिपावली के दिन फोन की घंटी बजी। उधर से फोन बच्चे उठाया आवाज बच्चे की पिताजी की थी। बोलते हुए अपने पिता जी से मासुमियत भरे लहजे में कहा – जाइये मैं आपछे लूठ गया हूॅं।
आप दिपावली में घर क्यों नहीं आए?न तो इस बार हम पटाखे फोड़ पाए और न ही फुलझड़ियाॅं‌ ही छोड़ पाए।
कट्टी, कट्टी, कट्टी।
पुचकारते हुए पिता ने बच्चे से कहा-अले ले ले इतनी छोटी सी उम्र में मेरा लाजा बेटा कितना समझदार हो गया अब कट्टी भी कर लेता है।
जब मैं घल आऊंगा तो तुम्हारे लिए एक बड़ा सा बिस्किट का डिब्बा लेता आऊंगा अब गुस्सा थूक दो।
बच्चा खुश होते हुए आ थू।
लेकिन आपको ये बताना पड़ेगा कि आप क्यों नहीं आए?
पिता ने बच्चे को एक बार फिर बात करते हुए तथा पुचकारते हुए कहा – बेटा बात ऐसी थी कि जिस रेलगाड़ी को पकड़ कर मैं दिपावली में घर आता उसका एक पहिया पंक्चर हो गया था।
फिर वो रेलगाड़ी आधे रास्ते से वापस लौट गई और फिर मैं दिपावली में घर नहीं आया और आपके साथ दिपावली नहीं मना पाए।
दिपावली के कुछ दिन बाद पिता घर गया तो एक बड़ा सा बिस्किट का डिब्बा लेता गया।
घर पहुंचते ही उसने वो बिस्किट का डिब्बा बच्चे को पकड़ाते हुए गोद में उठा लिया।
बिस्किट का डिब्बा पाकर बच्चा बहुत खुश हुआ और बिस्किट के डिब्बे को खोलने का इशारा किया जिसे पिता ने फुर्ती से खोल दिया।
बच्चा बिस्किट खाने लगा तथा गोद से उतर गया।
पापा एक बात बोलूं, पिता हां क्यों नहीं।
बच्चा रेलगाड़ी का पहिया कभी पंक्चर नहीं होता वह प्योर लोहे से बना होता है। पंक्चर तो बाबा की साइकिल होती है जब कभी मुझे बाज़ार घुमाने ले जाते हैं और फिर साइकिल पर बिठा कर बाबा मुझे घर तक पैदल ही लाते हैं।
आपने मुझे बुद्धु समझ रखा है क्या?
अब पिता सोच में पड़ गया बच्चे को कैसे समझाऊं।


© भुवनेश्वर चौरसिया “भुनेश”

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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