साहित्य

बुद्ध के प्रति

हे तथागत !
नमन तुम्हें ढशत बार।
तुम गरिमामय,
महिमा आवेष्टित ।
जिज्ञासु मन मेरा
अनेक प्रश्न अनुत्तरित।
उत्तर दो न।
हे तथागत !

बताओ तो प्रभु,
नवनीत कोमल मन लिए,
जग व्यथा -भार वहन किए,
कैस हो पाए निठुर?
कैसे कर पाए,
वृद्ध माता-पिता के
ममत्व की देहरी पार?

कैसे तोड़ पाए ,
समर्पिता कमनीया
अर्धागिंनी का प्रणय-पाश?
दुधमुंहे- वात्सल्य की
उमंगित- तरंगायित धार?

था रात्रि का निविड़ अंधकार।
कर शशि तारों की साक्षी
छंदस संग रथ पर सवार।
राजसी आभरण ,परिधान उतार।
मुंडित कुंचित केश भार।
कैसे हुए अग्रसर
एकाकी अनजान पथ पर?

कहो, कैसे सहा होगा ,
ऐश्वर्य में लालित -पालित
सिद्धार्थ तुमने
वन आतप,शीत प्रहार?
गर्जन वर्षण मूसलाधार?
क्षुधा, पिपासा, कष्ट अपार?

और तब,
जब मिला मध्य मार्ग,
सधे मन वीणा के सितार।
सम्यक स्वर की उठी झंकार।
बोधि प्राप्त कर बने बोधिसत्व,
चल दिए करने
जग उद्धार।।

पधारे प्रभु कपिलवस्तु
बही ज्ञानगंगा की अमिय धार।
देखी होगी ,
श्वेतकेशी यशोधरा
साध्वी पुनीता,
त्याग ,सौम्यता की
प्रतिमा साकार।
देखा होगा राहुल को,
प्रतिरूप तुम्हारा।
जिसे सहर्ष किया समर्पित
मातृत्व ने संघ को।

वह अनुपम उपहार।
कैसे कर पाए होगे
तुम यह स्वीकार?

कैसे रह पाए होगे,
तुम प्रबुद्ध बुद्ध ,
उस समय
निस्पृही, निर्विकार।

बताओ तो वीत राग
करो समाधान।
हे तथागत महान्।

वीणागुप्त
नई दिल्ली

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