साहित्य

ब- दस्तूर


आईने के सामने खड़ी होकर कोशिश करती हूं
अक्सर खुद को पहचानने की,
लगता है कहीं देखा है इस खुद को मैंने
पर बस देखा ही है ना जाने क्यों ,
इस को पहचानने की कोशिश
लंबे अरसे तक नहीं कर पाई मैं।
मुद्दतें निकल गई इस खुद को अनदेखा करने में
ना जाने किस किस, किस, किस को खुश करने में
खुद को ना याद रखने में,
आज खुद को जब निहारती हूं
तो बालों में चांदी, होठों में बेताजगी
चेहरे पर एक मायूस खामोशी दिखती है।
जो इशारा करती है
कितना सताया है इस खुद को
औरों की खुशियों की खातिर मैंने ,
ना कभी दिल की सुनी
ना कभी मन की करी मैंने ,
कितने खूबसूरत मौके छोड़ कर
अपने दिल को तोड़ कर ,
खुद की अनदेखी कर
इसको कितना सताया मैंने
कितना डराया मैंने।
केवल यह सोच कर कि चार लोग क्या कहेंगे
और आज वह चार लोग तो पता नहीं कहां पर है
पर सच बहुत शर्मिंदा हूं खुद से
और एक आम औरत की उस
गमों से भरी जद्दोजहद से मैं,
जो ना जाने कितनी सदियां तक
समाज में चलती रहेगी ब -दस्तूर।
स्वरचित सीमा कौशल
यमुनानगर हरियाणा

50% LikesVS
50% Dislikes

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!