कवितासाहित्य

भाता नहीं है कुछ भी

__प्रीति चौधरी “मनोरमा”

भाता नहीं है कुछ भी मन को
अब मर्माहत होने के बाद।
वो स्वर्णिम क्षण, वो रुपहले स्वप्न
वो समय व्यतीत होने के बाद।

आशाओं की साँझ ढल गई
मृत्यु सवारी और चल गई
खड़ी रही स्मृतियाँ हो मौन
स्वजनों को खोने के बाद।
भाता नहीं है कुछ भी मन को
अब मर्माहत होने के बाद…

कल फिर उगेगा भोर का तारा
मंगलमय होगा जग सारा
किंतु कहीं एक हूक उठेगी
मृत्यु शैया पर सोने के बाद ।
भाता नहीं है कुछ भी मन को
अब मर्माहत होने के बाद…

अंतर में होगा कोलाहल
सतही किंचित होगी न हलचल
भाग्य काटने आएगा फिर
कर्म फसल बोने के बाद ।
भाता नहीं है कुछ भी मन को
अब मर्माहत होने के बाद …

प्रीति चौधरी “मनोरमा”
जनपद बुलंदशहर
उत्तर प्रदेश

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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