साहित्य

भारत की आजादी का अमृतमहोत्व एव शिक्षा

भारत में शिक्षा

नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर

1- शिक्षा का महत्व —-शिक्षा और समाज किसी भी राष्ट्र और उसमे निवास करने वाले समाज की भौतिकता और नैतिकता का निर्धारण उस राष्ट्र के शिक्षा स्तर पर ही निर्धारित किया जा सकता है ।।विकास और सामजिक उद्धान दोनों का मूल मानव संसाधन है जब तक संसाधन श्रोत पूर्णतः परिस्कृत परिमार्जित ना हो ना तो रास्ट्रीय परिवेश में सशक्त समाज का निर्माण संभव है एवं ना ही राष्ट्र के विकास कि कड़ी को सक्षम शक्तिशाली बनाकर सम्पूर्ण विकास की अवधारणा का आधारभूत आधार कर राष्ट्र समाज को बुनियादी रूप से मजबूत बनाया जा सकता है ।।भारत को एक स्वतन्त्र राष्ट्र हुये तिहत्तर वर्ष हो चुके हैं परंतु शिक्षा के स्तर पर बुनियादी स्तर को भी नहीं प्राप्त पाये है ।।स्पष्ठ है आजाद गणतंत्र रास्ट्र भारत तिहत्तर वर्षों के बाद भी शिक्षा के स्तर पर समघ्र राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक कम से कम साक्षर हो के बुनियादी स्तर को प्राप्त करने हेतु हर सम्भव प्रयास अपनी क्षमताओ और उपलब्ध संसाधनों के अंतर्गत कर रहा है जो राष्ट्र के बहुमुखी विकास और सशक्तिकरण के लिये आनिवार्य संकल्प हैं।।
2—मानव शक्ति की वास्तविकता शिक्षा और मानव संसाधन विकास —– सम्पूर्ण ब्रह्मांड में जीवों की लाखो जातियां प्रजातियां है जिनके अलग अलग भौगोलिक बातावरण एवम् प्रकृति के अनुसार जन्म और जीवन शैली है जो जन्म जीवन और मृत्यु के मध्य सिर्फ सुरक्षा और भोजन की आवशयकता के लिये ही होती है।। पुरे कायनात में सिर्फ मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जिसे कुदरत द्वारा समझने सोचने सुनने अनुभव अनुभूति की क्षमता प्रदान की है ।।इन्ही गुणों के कारण मनुष्य जिन्हे जान सकता है समझ सकता है उन्हें खोजने की कोशिश करता है।।यह तभी सम्भव है जब मनुष्य शिक्षित हो यदि मनुष्य शिक्षित नहीं है तब वह कायनात के अन्य प्राणियो की भाँती हो जाता है ऐसे मनुष्यो का समाज स्वयं समाज और राष्ट्र समय पर बोझ तो होता ही है मात्र क्रिएचर रह जाता है क्रिएटर की उसकी अवधारणा समाप्त हो जाती है ।।और उसमे निहित शक्ति का सार्थक उपयोग विकास और समाज राष्ट्र के सशक्तिकरण में नहीं हो पाता ।।यदा कदा अशिक्षित मानव शक्ति विध्वंसक हो राष्ट्र में नकारात्मकता को जन्म देती है जो निरर्थक और व्यर्थ विनास का कारण बनती है।।भारत इसी सचचाई की वास्तविकता से झूझ रहा है ।।भारत में शिक्षा का स्तर निन्म होने के कारण मानव शक्ति खासकर युवा वर्ग अनावशयक तर्क कुतर्क में पड़ता है भावनात्मक रूप से प्रभावित होता है और उसमे निहित शक्ति उग्रता का वरण कर नकारात्म हो विनास को आमन्त्रित कर लेती है।।शिक्षा का स्तर निम्न होने के कारण राजनितिक अशिक्षा है जिसका प्रभाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर नकारात्म प्रभाव पड़ता है जो राष्ट्र् को कमजोर बनाती है।।इसलिये कहा जाता है की तानाशाह अपनी जनता का शिक्षित होना पसंद नहीं करता क्योंकि जब जनता शिक्षित होगी तब कर्तव्यों दायित्वों अधिकारो के प्रति सजग और जागरूक होगी तब शासन निर्मम नहीं हो सकता उसे सम्बेदन शील होना ही होगा ।।अतः स्पस्ट है शिक्षित समाज मजबूत समाज शिक्षित राष्ट्र विकसित राष्ट्र् विकसित राष्ट्र समबृद्ध राष्ट्र ।।
3—भारत में राज्य वार शैक्षिक स्तर भारत में—— भारत में सबसे अधिक ऊँचा शैक्षिक स्तर केरल का है जहा 2017 के आंकड़ो के आधार पर 93.9 प्रतिशत और सबसे कम बिहार में 63.82 प्रतिशत है।। पूरी तरह स्पस्ट है की सम्पूर्ण भारत के राज्यों में शैक्षिक स्तर 93.9 और 63.82 प्रतिसत के मध्य है।। सम्पूर्ण भारत शिक्षा का स्तर 74.04 प्ररिशत है।।
विश्व स्तर पर अगर देखा जाय तो भारत में शक्षरता का स्तर है 74.4 प्रतिशत जिसमे यदि पुरुषो में शिक्षा का स्तर 80.9 प्ररिशत महिलाओं में यह 64.60 प्रतिशत है ।। विश्वस्तर पर यदि देखा जाय तो कुल 195 देशो सबसे अधिक अशिक्षित आबादी 34 प्रतिशत लोग भारत में है जबकि सबसे कम चीन में लगभग मात्र 11 प्रतिशत आबादी ही अशिक्षित है कुल 195 देशो की शिक्षा स्तर के सूचि में भारत का स्थान 127 वां है।।
4–भारत में शिक्षा —- शिक्षा और समाज किसी भी राष्ट्र और उसमे निवास करने वाले समाज की भौतिकता और नैतिकता का निर्धारण उस राष्ट्र के शिक्षा स्तर पर ही निर्धारित किया जा सकता है ।।विकास और सामजिक उद्धान दोनों का मूल मानव संसाधन है जब तक संसाधन श्रोत पूर्णतः परिस्कृत परिमार्जित ना हो ना तो रास्ट्रीय परिवेश में सशक्त समाज का निर्माण संभव है एवं ना ही राष्ट्र के विकास कि कड़ी को सक्षम शक्तिशाली बनाकर सम्पूर्ण विकास की अवधारणा का आधारभूत आधार कर राष्ट्र समाज को बुनियादी रूप से मजबूत बनाया जा सकता है ।। भारत को एक स्वतन्त्र राष्ट्र हुये तिहत्तर वर्ष हो चुके हैं परंतु शिक्षा के स्तर पर बुनियादी स्तर को भी नहीं प्राप्त पाये है ।।स्पष्ठ है आजाद गणतंत्र रास्ट्र भारत तिहत्तर वर्षों के बाद भी शिक्षा के स्तर पर समघ्र राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक कम से कम साक्षर हो के बुनियादी स्तर को प्राप्त करने हेतु हर सम्भव प्रयास अपनी क्षमताओ और उपलब्ध संसाधनों के अंतर्गत कर रहा है जो राष्ट्र के बहुमुखी विकास और सशक्तिकरण के लिये आनिवार्य संकल्प हैं।।
5– मानव शक्ति की वास्तविकता शिक्षा और मानव संसाधन विकास — सम्पूर्ण ब्रह्मांड में जीवों की लाखो जातियां प्रजातियां है जिनके अलग अलग भौगोलिक बातावरण एवम् प्रकृति के अनुसार जन्म और जीवन शैली है जो जन्म जीवन और मृत्यु के मध्य सिर्फ सुरक्षा और भोजन की आवशयकता के लिये ही होती है।। पुरे कायनात में सिर्फ मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जिसे कुदरत द्वारा समझने सोचने सुनने अनुभव अनुभूति की क्षमता प्रदान की है ।।इन्ही गुणों के कारण मनुष्य जिन्हे जान सकता है समझ सकता है उन्हें खोजने की कोशिश करता है।।यह तभी सम्भव है जब मनुष्य शिक्षित हो यदि मनुष्य शिक्षित नहीं है तब वह कायनात के अन्य प्राणियो की भाँती हो जाता है ऐसे मनुष्यो का समाज स्वयं समाज और राष्ट्र समय पर बोझ तो होता ही है मात्र क्रिएचर रह जाता है क्रिएटर की उसकी अवधारणा समाप्त हो जाती है ।। और उसमे निहित शक्ति का सार्थक उपयोग विकास और समाज राष्ट्र के सशक्तिकरण में नहीं हो पाता ।।यदा कदा अशिक्षित मानव शक्ति विध्वंसक हो राष्ट्र में नकारात्मकता को जन्म देती है जो निरर्थक और व्यर्थ विनास का कारण बनती है।।भारत इसी सचचाई की वास्तविकता से झूझ रहा है ।।भारत में शिक्षा का स्तर निन्म होने के कारण मानव शक्ति खासकर युवा वर्ग अनावशयक तर्क कुतर्क में पड़ता है भावनात्मक रूप से प्रभावित होता है और उसमे निहित शक्ति उग्रता का वरण कर नकारात्म हो विनास को आमन्त्रित कर लेती है।।शिक्षा का स्तर निम्न होने के कारण राजनितिक अशिक्षा है जिसका प्रभाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर नकारात्म प्रभाव पड़ता है जो राष्ट्र् को कमजोर बनाती है।।इसलिये कहा जाता है की तानाशाह अपनी जनता का शिक्षित होना पसंद नहीं करता क्योंकि जब जनता शिक्षित होगी तब कर्तव्यों दायित्वों अधिकारो के प्रति सजग और जागरूक होगी तब शासन निर्मम नहीं हो सकता उसे सम्बेदन शील होना ही होगा ।।अतः स्पस्ट है शिक्षित समाज मजबूत समाज शिक्षित राष्ट्र विकसित राष्ट्र् विकसित राष्ट्र समबृद्ध राष्ट्र ।।
6–भारत में राज्य वार शैक्षिक स्तर — भारत में भारत में सबसे अधिक ऊँचा शैक्षिक स्तर केरल का है जहा 2017 के आंकड़ो के आधार पर 93.9 प्रतिशत और सबसे कम बिहार में 63.82 प्रतिशत है।। पूरी तरह स्पस्ट है की सम्पूर्ण भारत के राज्यों में शैक्षिक स्तर 93.9 और 63.82 प्रतिसत के मध्य है।। सम्पूर्ण भारत शिक्षा का स्तर 74.04 प्ररिशत है।।
विश्व स्तर पर अगर देखा जाय तो भारत में शक्षरता का स्तर है 74.4 प्रतिशत जिसमे यदि पुरुषो में शिक्षा का स्तर 80.9 प्ररिशत महिलाओं में यह 64.60 प्रतिशत है ।। विश्वस्तर पर यदि देखा जाय तो कुल 195 देशो सबसे अधिक अशिक्षित आबादी 34 प्रतिशत लोग भारत में है जबकि सबसे कम चीन में लगभग मात्र 11 प्रतिशत आबादी ही अशिक्षित है कुल 195 देशो की शिक्षा स्तर के सूचि में भारत का स्थान 127 वां है।। सम्पूर्ण विश्व का औसत शैक्षिक स्तर 90 प्रतिशत है महिलओं में यह दर 82.7 प्रतिशत है ।।विकसित राष्ट्रों में यह दर99.2 प्रतिशत पश्चिम एशिया में 70.2 प्रतिशत सब सहरन अफ्रीका में 64.0 प्रतिशत ओशिनिया 71.2प्रतिशत दक्षिण आफेरीका में यह दर 64 प्रतिशत है।। सपूर्ण विश्व की जनसंख्या का लगभग 17.7 प्रतिशत जनसंख्या भारत में है वहा 34 प्रतिशत लोग अशिक्षित है तो चीन जो जनसख्या की दृष्टिकोण से सबसे बड़ा देश है वहां अशिक्षा का स्तर विश्व में सबसे कम मात्र 11 प्रतिशत है ।। भारत में समाज जाती धर्म और छोटे छोटे समुदायों में बटा है जो भारत के सामाजिक रास्ट्रीय राजनिति परिस्थिति परिवेश विकास को प्रभावित करता है इस आधार पर यदि शैक्षिक विवेचना का अध्ययन किया जाय तो स्पस्ट है की वयस्कों में शक्षरता का प्रतिशत जहाँ 72.1प्रतिशत है तो युवाओ में यह 86.1प्रतिशत है ।।धार्मिक आधार पर भारत में शिक्षा का स्तर जहाँ 14.4 प्रतिसत कुल आबादी में जहाँ हिस्सेदारी है वही साक्षरता 68.5प्रतिशत है ।।हिन्दुओ में साक्षरता का प्रतिशत 73.3प्रतिशत क्रिस्टियन में 84.5 प्रतिशत सिक्खों में 75.4प्रतिशत जैन समुदाय में 94.9 प्रतिशत के साथ साथ पर्शियन में 100 प्रतिशत साक्षरता दर है।।एक तरफ चीन जनसँख्या की दृष्टि कोण से सबसे बड़ा देश होने के बाबजूद शिक्षा का स्तर काफी ऊँचा और मात्र 11 प्रतिशत आबादी ही अशिक्षितित है जबकि भारत भारत जनसंख्या की दृष्टि कोण विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है यहाँ अशिक्षा 27 प्रतिशत है।।यह आंकड़े बहुत निराशा जनक है खासकर भारत के संदर्भो में।।
7-धक्षिण एशिया में निम्न शैक्षिक स्तर का कारण ——दक्षिण एशिया के प्रमुख देशो में भारत ,पाकिस्तान ,बांग्लादेश , भूटान,नेपाल ,मालदीप ,श्री लंका है जहाँ साक्षरता दर विश्व के अन्य देशो की तुलना में कम है ।। इसका कारण भौगोलिक ऐतिहासिक आर्थिक सामाजिक और ऐतिहासिक है।।बंगला देश पाकिस्तान अफगानिस्तान भारत का ही हिस्सा था और भारत की सामजिक ऐतिहासिक परिशितियो का प्रभाव इस पुरे क्षेत्र में जबरजस्त है भारत में सातवी सदी से उथल पुथल का दौर प्रारम्भ हो गया और कभी लड़ाई और गुलामी का दौर प्रारम्भ शुरू हो गया छोटे छोटे रियासतो में बंटे भारत के साशक अपनी सम्पूर्ण शक्ति अपनी सत्ता को बचने में खर्च करते थे जो उस काल परिस्थिति की विवसता थी सामाजिक विकास और शिक्षा उनके व्यवहारिकता में प्राथमिकता चाहत के बावजूद नहीं संभव था।।दूसरा प्रमुख कारण आम जन मानस का धर्म जाती के छोटे छोटे टुकड़ो में बटा होना और आपसी विद्वेष सामजिक कुरीतिया आदि भी प्रमुख कारण शिक्षा को जीवन मूल्य के तौर पर विकसित करने में वाधक थी।। गुलामी के कारण जन मानस की सम्पूर्ण मानसिकता स्वयं एवम् स्वयं के सामजिक अस्तित्व की सुरक्षा और उसके मूल को बचाने के लिए ही संघर्ष रत थी। शिक्षा तो उसके लिये उस मृगतृष्णा के सामान थी जिसमे वह जाना ही नहीं चाहता था।।इस बड़े क्षेत्र में वाह्य शासको द्वारा आयातित संस्कार संस्कृतियों ने भी शिक्षा की चाह राह में महत्व्पूर्ण भूमिका अदा किया कभी फ़ारसी कभी अरबी कभी अंग्रेजी बदलते शासन और शासक ने गुलामी की आदत तो डाल दी सम्पूर्ण वास्तविकता ही वर्ण शंकर हो गयी जो इस विशाल क्षेत्र की जनता को उनके मूल संस्कृति संस्कारों से भटकाकर दिवभ्रमित कर दिया वो खुद को और खुद के खोये अस्तित्व को खोजने और बचे अस्तित्व को बचाने हेतु ही जद्दोजहद करने में जिंदगी का संघर्स बीत जाता ।।कुछ यैसे आक्रांता भी इस क्षेत्र में आये जिन्होंने आतंक और खौफ क्रूरता की सारी मन्याताये मर्यादाये सीमाये तोड़ कर यैसे भय के बातावरण का निर्माण कर दिया की सामान्य जनमानस जीवन को ही बचाने के लिये जीने लगा शिक्षा तो उसके लिये सोचने की भी बात नहीं थी।।बृहत्तर भारत के पडोसी राज्य नेपाल को कभी भी गुलामी का दंश नहीं झेलना पड़ा है क्योकि उसकी भौगोलिक स्तिति यैसी है जिसके कारण किसी भी आक्रमण कारी ने कभी भी आक्रमण का साहस नहीं जुटाया मगर शासन् की लाख मंशा के बाबजूद वहां के सामजिक सरचना एवम् उनके व्यवहारिक संस्कृति संस्कारो ने शिक्षा को प्राथमिकता नहीं दिया।।लंका और मालदीप प्रयदीप है जहा संसाधन की कमी और प्राकृतिक व्यवहारों पर ही समाज राष्ट्र की प्रगति निर्भर करती है अतः संसाधनों की कमी और उपलब्ध संसाधनों को अवसर और सामजिक उपलब्धि उत्थान में उपयोगी बनाकर उसका उपयोग कर सकने में शासक शासन ने या तो प्रयास नहीं किये या तो उनमे इक्षा शक्ति की कमी थी जिसके कारण शिक्षा का विकास होना या शिक्षा विकास को एक दूसरे का पूरक सिंद्धांत के समाज का निर्माण नहीं कर पाना संभव नहीं हो सका।।
8–अंतरास्ट्रीय बदलता परिवेस……..सत्रहवी और अठ्ठरहवी सदी में अन्तर्रास्ट्रीय परिदृश्य में बदलाव का दौर माना जाना समचीन और सार्थक होगा जहाँ अधिकतर भू भाग पर ब्रिटिश हुकूमत का बोल बाल था और ब्रिटिश की खासियत है की वह मूल रूप से मानवीय मूल्यों का पोषक होता है ।।यह वह दौर था जब पश्चिम में नयी अवधारणा की शक्तियो का अभ्युदय हो रहा था तो ब्रिटिश हुकूमत भी अपने शाषित राष्ट्रो में मानवीय विकास की संरचना का आधार का विकास कर रही थी हो सकता है वह यैसा अपने शासन को दीर्घकाल तक अनवरत जारी रखने के लिये कर रही हो मगर इसका प्रभाव सार्थक रहा और अन्य विकास के साथ साथ शिक्षा के क्षेत्र में जागरूकता अवश्य आयी भारत में भी इसका प्रभाव पड़ा और शिक्षित समाज ने जन्म लेना प्रारम्भ किया जब समाज शिक्षित होता है तो जागरूक होता है ।यही वह दौर है जब सामाजिक स्तर पर अनेको सुधारवादी आंदोलनों ने जन्म लिया ।।यैसा नहीं था की इससे पूर्व शिक्षा समाज में थी ही नहीं थी मगर जन सामान्य के लिये कठिन और चुनौतीपूर्ण थी।।सिकन्दर के आक्रमण के बाद और चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन के दौरान विष्णु गुप्त आचार्य चाणक्य ने शिक्षा और शिक्षित समाज को राष्ट्र की मौलिक चेतना और आत्मा से जोड़ने का सार्थक प्रयास किया था परन्तु वह सिमित रह गया और व्यापक नहीं हो सका।। सत्रहवी और अठ्ठारहवीं सदी में अन्तरस्ट्रीय स्तर पर अनेको विज्ञानिक आविष्कार हुये और विज्ञानं और वैज्ञानिक युग के उत्कर्स का युग प्रारम्भ हुआ।।उन्नीसवी सदी अंत्यंत महत्व्पूर्ण इसलिये भी है की बदले अंतरास्ट्रीय परिदृश्य में दो विश्वयुद्ध हुये और पूरा विश्व दो विचार धाराओ में बँट गया अस्तित्व और सीमाये बदली साथ ही साथ संस्कृति और शिक्षा स्तर पर भी जागरूकता आई लार्ड मैकाले की शिक्षा निति उन्नीसवी सदी में भारत में शिक्षा के क्षेत्र में एक बुनियादी विगुल कहा जा सकता है हलाकि लार्ड मैकाले की शिक्षा निति ब्रिटिश मनसा के अनुरूप थी फिर भी इसने आम जन में शिक्षा के महत्त्व को समझने में सार्थक भूमिका निभाई।।
9-आजाद भारत और शिक्षा……सन् उन्नीस सौ सैतालिस में भारत आजाद तो हो गया मगर दो टुकड़ो में बंट गया जो अब तक अभिशाप बनकर आजादी के अर्थो का परिहास उड़ा रहा हैं ।।आजादी के बाद बटवारे के दंश में धर्म के आधार पर बाटे दो राष्ट्र कहाँ तक अपने बुनियादी विकास के लिए प्रयास करते आपस में ही लड़ते अपने उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते ।।आजादी के बाद भारत में महात्मा गांधी जी ने प्राथमिक शिक्षा के अवधारणा का सिध्दान्त आजाद राष्ट्र के समक्ष रखा जिसे मुर्त स्वरुप प्रदान करने के लिये गंभीर प्रयास किये गए।।आजादी के संघर्षो के दौरान ही पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की तो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना सैय्यद साहब ने की।।कलकत्ता में
भारत की आज़ादी की लड़ाई एवम् संघर्षों के नब्बे वर्षो का लंबा काल ब्रिटिश शासन के पास उपलब्ध अधिकतम संसाधन आजादी की लड़ाई को दबाने और उससे निपटने में ही व्यर्थ हो जाती और उस समय का युवा भी आजादी के संघर्षो का मुख्य हिस्सा हुआ करता था शिक्षा उसका हथियार अठ्ठारह सौ पच्चासी भारतीय राश्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद भारत में एक समग्र चेतना का जागरण हुआ जो आजादी के पृष्ठ भूमि के निर्माण में सहायक और सार्थक भूमीका का आधार बना और आजादी के भाव भावना के संचार का धार बना ।। भारत की आज़ादी और दो राष्ट्रों का धर्म के आधार पर जन्म अत्यन्त पीड़ा दायक और एक नए दौर के संघर्षो की बुनियाद बना।। 10-आजादी के बाद भारत और शिक्षा……….पंद्रह जनवरी सन् उन्नीस सौ सैतालिस को भारत आजाद हुआ उसके सामने आतंरिक और वाह्य चुनौतियां सामने खड़ी थी पहली चुनौती तो छोटे छोटे टुकड़ो को एकठ्ठा कर एक एकात्म राष्ट्र् का निर्माण करना तो दूसरी तरफ धर्म के आधार पर अलग हुआ राष्ट्र पाकिस्तान तरह तरह की चुनौती प्रस्तुत कर रहा था ।।इसके साथ ही साथ नए राष्ट्र को अपने नए संबिधान का निर्माण और राष्ट्र के विकास के मूलभूत ढ़ाचा गत आधार का निर्माण साथ ही साथ विकास के लिये संसाधन का निर्माण इन तमाम चुनौतियों के साथ राष्ट्र की जनता को बुनियादी सुबिधाये स्वास्थ शिक्षा आदि का विकास करना प्रमुख चुनौतियां थी।।
आजाद भारत की तत्कालीन जन्संख्या छत्तीस करोड़ थी जो आज एक सौ तैतीस करोड़ हो गयी है।।आजादी के संघर्षो के दौर में भारत में तीन विश्वविद्यालय छै इंगिनीरिग कॉलेज दो मेडिकल कॉलेज बाद में मदन मोहन मालवीय जी द्वारा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय और सर सैय्यद जी द्वारा अलीगढ़ विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी।।आज भारत में अड़तालीस केंद्रीय विश्वविद्यालय तीन सौ इक्यावन राज्य विश्वविद्यालय दो सौ पैंतीस मेडिकल कॉलेज नौ एम्स दस हज़ार तीन सौ छियालीस इंजीनियरिंग कालेज चौसठ कृषि विश्वविद्यालय पांच सौ छिहत्तर जवाहर नवोदय विद्यालय बारह सौ पच्चीस केंद्रीय विद्यालय इसके अतिरिक्त उच्च श्रेणी के अनुसन्धान कैद्र शैक्षिक सनाथान शिक्षा के लिये उपलव्ध है।
इतने बड़ी आबादी और क्षेत्रफल के देश में शिक्षा संस्थानों की सुलभता और पर्याप्ता नहीं है तो जो पर्याप्ता सुलभता है भी उसकी गुणवत्ता अंतरास्ट्रीय स्तर पर नहीं है विश्व के दो सौ सर्वोत्तम प्रतिष्ठानो में आज भी कोई भारत का विश्वविद्यालय या शिक्षा प्रतिष्ठान नही है।।आज अठ्ठारह से चौबीस वर्ष तक के युवा जिनकी संख्या भारत की कुल आबादी का लगभग बीस प्रतिसत है के लिये शिक्षा के पर्याप्त साधन जुटाने की आवश्कता है जिसके लिये राज्य् एवम् केंद्र सरकार दोनों के द्वारा अपने उपलब्ध संसाधनों में निरंतर प्रयास किया जा रहा है।।जहाँ तक प्राथमिक शिक्षा की बात है लगभग हर गाव में प्रथमिक स्तर के सरकारी विद्यालय उपलब्ध है जहा योग्य शिक्षकों के साथ साथ मुक्त दोपहर का भोजन स्कुल की किताबे ड्रेस प्रदान करने के साथ साथ कमजोर वर्गो को स्कालरशिप भी प्रदान की जाती हैं फिर भी अकसर प्राथमिक विद्यालयो में पढने वाले छात्रो की ही कमी है। कही कही तो यैसा भी है की जितने अध्यापक है उतने भी विद्यार्थी नहीं है। वही मैकाले की शिक्षा निति आज भी इस स्वतंत्र राष्ट्र् भारत में शिक्षा का बुनियाद बनी हुई है। कॉन्वेंट कल्चर हावी है सरकार ने भी सस्ते दरों पर कान्वेंट स्कूलों के लिये मूल भुत सुविधाये उपलब्ध कराने में कोइ कोर कसर नहीं छोड़ी है इन कान्वेंट स्कूलों में महगी शिक्षा होने के बाबजूद हर भारतीय अपने बच्चों को शिक्षा के लिये अपने बच्चों को भेजने के लिये हर जतन करता है।एक आंकड़े के अनुसार केवल मुम्बई में ही लगभग पंद्रह सौ करोड़ संभवतः इतना वार्षिक कुल बजट शिक्षा का पुरे मुम्बई का नही होगा सालाना कान्वेंट स्कुलो का व्यवसास है । कान्वेंट शिक्षा के बाज़ारीकरण और व्यवसायीकरण का श्रेष्टतम उदगरण है ।क्या कारण हो सकता है की महगी शिक्षा भारत में भारतीयो के लिये आकर्षण है और सस्ती शिक्षा अपेक्षा की उपेक्षा स्पस्ट है की रोजगार के अवसर कान्वेंट कल्चर के लिये अधिक है या तो यह भ्रम है या स्टेट्स की पहचान सत्य तो यही है की कान्वेंट कल्चर ज्यादा सफल और स्वीकार है।
भारत सरकार और राज्य सरकारो द्वारा रास्ट्रीय साक्षरता मिशन ,सर्व शिक्षा अभियान ,स्कुल चलो अभियान बड़ी ही दृढ़ता और कुशलता से चलाये जा रहे है फिर भी अपेक्षित सफलता नही प्राप्त हो सकी है कारण है शिक्षा के प्रति भारत की आम जनता में उत्साह की कमी का होना साथ ही साथ शिक्षा का रोजगार परक ना होना शिक्षा का मूल उद्देश्य राष्ट्र के लिये उपयोगी नागरिक का निर्माण करना जिससे राष्ट्र् में शिक्षित समाज हो और राष्ट्र की मुख्य धरा से जुड़ राष्ट्र के विकास में सहायक हो सके।सिमित संसाधनों और जनसंख्या के बोझ ने भारत में शिक्षा के उद्देश्यों को ही बदल कर रख दिया है।शिक्षा और रोजगार दोनों एक दूसरे के पूरक है शिक्षित बेरोजगार नवयुवको की भीड़ ने शिक्षा की प्रसंगिगता पर प्रश्न चिन्ह खड़ी करती है जिससे आने वाली पीडी में शिक्षा के प्रति उत्साह में कमी दिखती है। दूसरा कारण यह है की भारत में आज भी पूरी आबादी का लगभग पचास प्रतिसत आबादी गरीब है जो दो वक्त की रोटी के लिये ही जीवन में संघर्ष करती है उनके घरो के बच्चे जब स्कुल जाने की उम्र में आते है तो उनके माँ बाप यह चाहते है की उनका बच्चा जितनी देर स्कुल में बिताएगा उतने समय में मेहनत मजदूरी कर कुछ कमा लेगा जिससे उनकी रोटी चल सकेगी इसका कारण पढ़ लिखलेने के बाद रोजगार की गारण्टी नहीं होती।भ्रष्ट्राचार भी भारत में अशिक्षा का प्रमुख़ कारण है जो भारत के समाज में दीमक की तरह समाया है और हर क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित क़र रखा है।
प्रौढ़ शिक्षा अभियान भी भारत में आजादी के बाद एक महत्वाकाँन्क्षि सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत महत्वाकांक्षी योजना है जिससे साक्षरता दर में बृद्धि हुई है।।हर मौहल्ले में कान्वेंट स्कूलो ने भी एक सार्थक भूमिका का निर्बहंन किया है।।शिक्षा के क्षेत्र में बहुत कुछ किया जाना अभी बाकी है ।।बहुत से ऐसे उद्योगों में जहाँ मजदूरी करने वाले मजदूरो के बच्चों को शिक्षा की व्यवस्था की गयी है ।।अनेको स्वयंसेवी संस्थाओ ने भी शिक्षा के क्षेत्र में महत्व्पूर्ण योगदान कर रही है।।विकलांगो की शिक्षा के लिये अनेको विकलांग विद्यालयों ने भी विकलांग जनो को शिक्षित करने में अपने दायित्वों का उचित निर्वहन कर रही है।।संस्कृत शिक्षा और उर्दू शिक्षा की भारत में अलग अलग व्यवस्था ने संस्कृत पाठशाला से लेकर विश्वविद्यालय तक तो उर्दू फ़ारसी की शिक्षा मकतब दारूम उलूम विश्वविद्यालय तक स्थापित शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रहे है फिर भी भारत में शैक्षिक स्तर अपेक्षा के अनुरूप नहीं है।। 11-मह्त्वपूर्ण पहल जो अवश्यक है …..1-शिक्षा को रोजगार से जोड़ना ।।2-शिक्षा को रोजगार की गारण्टी बनाना।।3-रोजगार परक शिक्षा का विकास।।4-उपलब्ध संसाधनों का शिक्षा में सार्थक उपयोग ।।5-जनसख्या नियंत्रण और संसाधन और जनसंख्या का अनुपात स्थिर रखना जिससे संसाधनों का सही उपयोग।।6-शिक्षा को सामजिक कुरीतियो और मान्यताओ से ऊपर मानवीय मूल्य के रूप में स्थापित करना।।7-शिक्षा के मौलिक अधिकार को स्वंत्रता के मानवीय अधिकार के स्वरुप में सर्वस्वीकार करने के लिये ठोस फहल प्रयास सामाजिक चेतना के रूप में करना।।8-हर बच्चे का स्कुल जाना सुनिश्चित करना।।9-जो भी भारतीय नागरिक अपने बच्चे को स्कूल भेजने की अपेक्षा मासूम के श्रम को अपनी रोजी रोटी का जरिया बनाता हो बाल श्रम कानून में दंड के यैसे सरक्षक के लिये व्यवस्था करना।।10-शिक्षा की अंनिवार्यता और अनिवार्य शिक्षा की पहल करना।।
नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर गोरखपुर उत्तर प्रदेश।।

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