साहित्य

भारत के गौरव विवेकानंद जी

ओम प्रकाश श्रीवास्तव ओम

कलकत्ता नगरी हुई धन्य
जब नरेंद्र धरा पर आया।
भुवनेश्वरी विश्वनाथ युगल
सुत रूप इक हीरा पाया।

सारे भारत में वह घूमे,
किया स्वयं को जग समर्पित।
खोजपूर्ण जीवन निज जी कर,
किया जीवन सार जगत अर्पित।
मानव से मानवता होती,
सार सबको यह समझाया।
कलकत्ता नगरी हुई धन्य
जब नरेंद्र धरा पर आया।

मानवता होती पावन सबसे,
अनुपम सबसे यह सिद्धांत।
कह दरिद्र देवो भव आपने
किया सपने को संभावित।
विचार शिकागो सुन आपके
सकल विश्व था अति हर्षाया।
कलकत्ता नगरी हुई धन्य
जब नरेंद्र धरा पर आया।

चार जुलाई उन्नीस सौ दो,
त्यागे स्वामी ने निज प्राण।
कष्ट अनेकों सहकर तुमने
किया सदा मानव कल्याण।
नहीं भूल सकते तुमको हम
तुमसे जीवन लक्ष्य पाया।
कलकत्ता नगरी हुई धन्य
जब नरेंद्र धरा पर आया।।

ओम प्रकाश श्रीवास्तव ओम
तिलसहरी, कानपुर नगर

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