साहित्य

भीतर भाव घिनवना बा

अमरेन्द्र

कनक रजत के महल बनल बा,
मखमल बिछल बिछवना बा।
ऊपर से बा चाकचुक पर,
भीतर भाव घिनवना बा।

एक हाथ तलवार कटारी,
दूजा हाथ इयारी के।
बातचीत बा प्रीत रीत के,
चाल ढ़ाल बैपारी के।
जीभ भइल बा चार हाथ के,
तर में बुद्धि बवना बा।
कनक रजत के महल बनल बा,
मखमल बिछल बिछवना बा।

डेग डेग बाजार सजल बा,
दाम लगत बा हाया के।
उर अन्तर में मइल भरल बा,
उबटन लागे काया के।
नीचे में नटखेल होत बा,
ऊपर चढ़त चढ़वना बा।
कनक रजत के महल बनल बा,
मखमल बिछल बिछवना बा।

माला गर में आलजाल के,
खार सुनुस के जंतर बा।
घात मात के दौर चलल बा,
दाव पेंच के मंतर बा।
लोभी के कर चाभी बाटे,
मनई बनल खिलवना बा।
कनक रजत के महल बनल बा,
मखमल बिछल बिछौना बा।

सतजन बिदजन बात न माने,
कवन ठिकाना बनचर के।
टके सेर जज्बात बिकाता,
मान जान बा जलखर के।
तीर तान के खड़ा शिकारी,
साँसत में मृग छवना बा।
कनक रजत के महल बनल बा,
मखमल बिछल बिछवना बा।

अमरेन्द्र
आरा भोजपुर बिहार।

100% LikesVS
0% Dislikes

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button
error: Content is protected !!