कवितासाहित्य

भूखमरी

__कात्यायनी कदम

टुकड़े-टुकड़े रोटी को
गुड़िया छोटी रोती है,
छः जनों के झोपड़े में
एक तवे पर रोटी है।

उठ सवेरे बेचे बच्चे
ले ठेले पर सब्जी साग,
क्या इतनी कमाई होगी
बुझ पाएगी पेट की आग।

मुनिया को बुखार हुआ
कहाँ मिले कोई उपचार,
डॉक्टर साहब मनमर्ज़ी के
कैसे उतरेगा बुखार।

अस्पताल में मारामारी
हो गई सुबह से शाम,
माँ न आई अबतक वापस
भूखे बच्चे पड़े बेजान।

छूए आसमां दाम दवाई
खतम हुए बचाए नोट,
कैसे आएगा आटा चावल
बेरहम मँहगाई की चोट।

मारे भूख से छटपट बच्चे
खा गए कुछ कच्चे साग,
हुए दस्त से रोगी सारे
आह! कैसा है जीवन अभाग।

मुनिया, छोटी, गुड़िया, सोना
चली छोड़ के दुनिया रोती,
छः जनों के झोपड़े में
भूखमरी अब चैन से सोती।

कात्यायनी कदम

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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