साहित्य

मज़ा नहीं है

किरण झा


जी रहे अपने मन से जिंदगी
कहते हो कि मजा नहीं है
दे रहे इक दूजे को धोखा
कोई किसी का सगा नहीं है

हैं एक दुजे में खोये खोये
आंखें खुली हैं पर सोये सोये
लगी नुमाइश इश्क की अब तो
फिर भी कहते कि वफ़ा नहीं है

जी रहे अपने मन से जिंदगी
कहते हो कि मजा नहीं है

रिश्तों की करते हैं नुमाइश
एक दुसरे की है आजमाइश
गढ़ते हो अपने पन की दुनिया
नजरों में किसी के हया नहीं है

जी रहे अपने मन से जिंदगी
कहते हो कि मजा नहीं है

धुआं धुआं सा दिखे फिजाएं
दिखा रहे सब अपनी अदाएं
दर्द जब बढ़ गया जींद में
कहते हो कि खुदा नहीं है

जी रहे अपने मन से जिंदगी
कहते हो कि मजा नहीं है

वक्त की धारा बह रही है
चीख चीखकर ये कह रही है
जी रहे हो मर मर कर देखो
सोचा करते कजा नहीं है

जी रहे अपने मन जिंदगी
कहते हो कि मजा नहीं है
किरण झा ✍🏻✍🏻

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