कवितासाहित्य

मतङ्ग के कान्हा

__डॉ आर के मतङ्ग

कान्हा तेरी जीत पर,
आये मुझको तरष।
तेरे नयना हरष रहे हैं,
मेरे नयना वरष।।

सोचा था तू मेरा दाता,
तुझसे जन्मों का नाता।
दिला भरोसा तू ही सबको,
धरती पर है स्वर्ग से लाता।।

पर तू तो निकला छलिया रे,
स्वप्न में भी न आता-जाता।
जगा मोह अति मुझमें प्यारे,
अंत में गीता ज्ञान बताता।।

मुझे ज्ञान से क्या मतलब रे,
जब तू ही है भाग्य विधाता।
कैसा प्रेम है तेरा कान्हा,
जीवन भर केवल तड़पाता।।

होगा तू गिरिधारी,नटवर,
क्योंकर फर्क पड़े अब भ्राता।
अंत वफ़ा में मर जाऊँगा,
तेरी जफ़ा के गीत को गाता।।

लेट जाऊँ जब काठ चिता पर,
बजाऊँ ताली हरष।
तेरे नयना तब बरसेंगे,
मेरे उठेंगे हरष।।


डॉ आर के मतङ्ग
श्री अयोध्या धाम

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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