साहित्य

मन उदास होकर आज,चंचल किरण को ढूँढता हैं!

मन उदास होकर आज,चंचल किरण को ढूँढता हैं!
मूक होकर शब्द सुनना,आज जीवन कह रहाँ हैं!!
जो अधर से शहद भाषा,कहें अपनी सदैव यहाँ!
जीवन के राह का वास्तविक,वही तो अब सर्प हैं!!

मुख ये चमके सूरज के जैसे,चाँद सा शरमा रहाँ हैं!
आज अपने गम के तम में,खुशियाँ कोई मना रहाँ हैं!!
स्नेह के समबन्ध टूटा तो,नयनों से नीर बहाँ रहाँ हैं!
आज फिर कोई मनचला,भौंरा हमें पागल बना रहाँ हैं!!

जीवन के राह में दुःख दर्द,जो देता अब तक रहाँ हैं!
छोड़कर चलें उसे जहाँ,अपने मंजिल का ना पता हैं!!
मौन होकर ये तो सरिता,आज बहुत कुछ कह रहीं हैं!
प्रेम में विहवल ये मन,क्यू उसको ढूँढती अब हैं!!
स्वरचित एवं मौलिक रचना
नाम:- प्रभात गौर
पता:- नेवादा जंघई
प्रयागराज
(उत्तर प्रदेश)

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