साहित्य

मन की पंखुड़ियों पर

मन की पंखुड़ियों पर .तुम्हारी हल्की सी छुअन
ओस की बूंदों सी, गिरती मन पर प्रीत तुम्हारी।

भोर में चमकती, एक सुनहरी तरोताजा सुबह
कभी सुरमई सांझ सी , ढलती प्रीत तुम्हारी ।

जीवन के क्षण क्षण में, शुष्क और नरम कभी।
सागर में लहरों सी , उल्लसित प्रीत तुम्हारी ।

सूखे हुए टहनियों पर नई कोपलों का आना।
ऐसे ही जीवनपतझड़ में मधुमास सी प्रीत तुम्हारी।

बेतरतीब सब कुछ घड़ियां पर्दे और दीवारें ,तुम।
फिर भी अमृतजल सी,अंजुल भर प्रीत तुम्हारी।

सरिता सिंह गोरखपुर उत्तर प्रदेश।

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