कवितासाहित्य

माँँ का वात्सल्य

__– नरेन्द्र प्रसाद सिंह

ताल पत्र से बुने पंखे झलते
माॅऺ को देखा था मैंने
वात्सल्य के रसीले रसों से सने
मधुरस को चूसा था मैंने

माॉऺ की लोरियाॅऺ सुनकर
थपकियाॅऺ खाकर
नींद की थपकियों में सपने
देखे थे मैंने

आज माॅऺ के साथ
लोरियाॅऺ भी चलीं गईं
माॅऺ का वात्सल्य अपनत्व
घिनौने बाज़ार में
बेचे जा रहे हैं

इसके साथ- साथ बिक रही है
पुत्रत्व की चंचल शेखी चाल!

  - नरेन्द्र प्रसाद सिंह
    नवादा (बिहार)

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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