कवितासाहित्य

माँ

__डॉ रामशंकर चंचल

मां
उम्र के उस मुकाम पर
जहां हम हो जाते है
बेकार। बेकम
पर में मां को
देखता हूं
वह आज भी
यूथ जाती हैं


सबसे पहले
पता नही रात
वो सोयी या नहीं
उठने के साठ ही
दौड़ जाती हैं
उसके मस्तिष्क में
न जाने कितने
चिंताएं। समस्याएं
सारी चिंताओं को पले
रहती हैं हर पल
कार्य कार्य है
सदा अपनी शक्ति से
अधिक
हर पल। हर रोज
सोचता हूं
उसका ममत्व है
जो देता है उसे
शक्ति
मैं नही जानता
उसके ममत्व का
कितना कर्ज उतारते
उसके बेटे
हां, यह जरूर जनता हूं
बेटे का उदास चेहरा
कर देता है उसे
भीतर तक दुःखी
पता नहीं तब
मन हो मन
वह कितनी
ले लेती है
मन्नत
उस उदास चेहरे के
खिलखिलाने की
आस में


डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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