साहित्य

माँ

प्रेमबजाज

विषय— #मां_हिन्दी

कहते हिन्दी मातृभाषा है,
क्या इसे मां सा सम्मान मिल पाता है।

मात्र कहने भर से कोई मां नहीं बन पाती,
मां का दर्जा भी तो दिया जाता है।

छोड़कर मां को अपनी, क्या कोई दूसरों के आंचल में छिप सकता है।

जैसे आज जहां में अधिकतर छोड़ हिन्दी को अन्य भाषाओं की तरफ हर इन्सां झुकता है।

जो बोलकर अन्य भाषाएं आज इतराते हैं,
पूछो उनसे कोई ज़रा क्या अन्य देशों के लोग छोड़ अपनी भाषा हमारी हिन्दी को अपनाते हैं?

फिर क्यों हम अपनी भाषा का ना आदर करें,
बस कर हिन्दी के प्यारे शब्द अपनी मातृभाषा को नमन सादर करें।

एक शब्द के दो-दो अर्थ वाली भाषा मुझ को समझ ना आती है,
हिन्दी, हिन्दुस्तान के माथे की बिंदी, मुझको तो बस यही भाषा भाती है।

संस्कृत के श्लोकों से निकली, संस्कार भी हमें सिखाती है,
देखो ज़रा बच्चों को हिन्दी सिखा कर, कितने प्यार से ये बोली जाती है।

किसी भाषा में हो लिखी कविता, भाव ना इतना भाता है,
हिन्दी की कविता पढ़ के उर-आंगन पुलकित हो जाता है।
ज्युं भाव हो मेरे ही मन के, वो अहसास जग जाता है,
हिन्दी का मान करो, हिन्दुस्तान की जान है, गर्व है ये हिन्दुओं का, हिन्दी हमारी मातृभाषा है।

प्रेम बजाज ©®
जगाधरी (यमुनानगर)

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