कवितासाहित्य

मां की जिमेदारी

__लेखिका मनीषा झा
सिद्धार्थ नगर
यूपी

पापा कहते मां सच कहती है
आखिर नौ महीने गर्भ में जो रखी हैं,

प्रसव वेदना जो उन्होंने तुम्हारे लिए सही हैं,
जब तुम 14,15,की उम्र में आती हो तो

खट्टा कम खाने को कहती हैं,मगर मां की
बात तुम्हें नहीं सुहाती हैं,अगर मांसाहार हो

तो अधिक सेवन से मना करती हैं,जीवन का
अनुभव हैं उसे वो तुम्हे हर पग पर रोकती हैं,

मांसाहार बीमारी की जड़ हैं,शाकाहार अपनाने
से मन चित शुद्ध के साथ स्वस्थ शरीर भी रहता
हैं, मां सच कहती हैं पापा कहते हैं,

जब तुम 18 वर्ष पार करती हो,तो बढ़ जाती हैं,
मां की जिमेदरियां तुम्हारी कोई एक गलत कदम

पर उठती हैं मां पर उंगलियां,उसकी परवाह तुम्हें
लेकर होती जो अकसर रोकती टोकती हैं,इसका

मतलब ये नहीं कि वो तुमसे प्यार नहीं करती हैं,
कई बार ऐसा होता हैं जब घर में सभी प्यार करने

लगते नाना, दादा ,दादी ,नानी पूरा परिवार तुम्हारे
जायज़ नाजायज डिमांड को प्यार के आगे मानने

लगते हैं तब मां को पिता की जगह लेनी पड़ती,
कभी प्यार तो कभी फटकार इसका मतलब ये नहीं

की वो तुम्हें प्यार नहीं करती वो अनुभवी होती हैं,
उसने जीवन के उतार चढ़ाव जिया हैं,उसका फटकार

भी प्यार ही होता,ताकि तुम्हे जीवन में कोई कष्ट ना हो आगे,
रोक टोक के पीछे सिर्फ परवाह ही होती हैं, ट्रेन में खुद स्लीपर

या ac 3 टियर में चलती पर तुम अकेली सुरक्षित सफ़र करो,
इसलिए,ac 2 टियर में सीट ऐबलेबल ना हो तो ac1 टियर में
भेजती हैं,ये पाबंदी नहीं एक मां का फ़िक्र होता हैं,

बाहर निकलो तो कायदे के कपड़े पहनो जिसमें शालीनता
झलके, दुपट्टा सही रखो गले में माला ना बनाओ पर ये बात

शायद तुम्हें बुरी लगती,तूम कुछ बोलती तो नहीं बाते भी मान
लेती हो पर चेहरे के एकस्प्रेस्न से एक मां जान लेती हैं,तुमने

अपने भाई से कहा मां मुझे बहन जी टाईफ बना देती हैं,जब
उसकी परवाह और सलाह तुम्हे पुराने ख्यालात लगने लगते हैं,

जब तुम्हें लगता हैं कि तुम अपना ख्याल खुद रख सकती हो,
तब उसकी जिमेदारियां और बढ़ जाती हैं,

कभी कभी जब उनकी बात तुम अनसुना कर के निकल
जाती हो,जब वो कहती कि दुपट्टा लेे के जाओ,उन्हें तब

भी बुरा नहीं लगता वो ये सोचती रहती हैं ना जाने किस
निगाह से बाहर देखेंगे सब तुमको,पापा कहते हैं हां मां
सही कहती हैं,

वक्त के साथ तुम जवानी में कदम रखती हो और
ना जाने तुम कितनों को पसंद आती हो,पर सच मानो,

उनको तुम्हारा रूप और जिस्म पसंद होता,ये बात एक
मां जानती हैं पर समझा नहीं पाती तुमको,क्युकी आज

के बच्चें जेनरेशन गैप कह के कब का दूर कर देते
खुद से,वो सब समझती हैं, सब देखती हैं,पर वो चुप हैं तुम्हारी खुशी के लिए,

लेखिका मनीषा झा
सिद्धार्थ नगर
यूपी

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कुमार संदीप

अध्यापक सह लेखक । निवास स्थान- सिमरा(मुजफ्फरपुर) बिहार । विभिन्न साहित्यक पत्र पत्रिकाओं में निरंतर रचना प्रकाशन । कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित । वर्तमान में ग्रामीण परिवेश में अध्यापन कार्य सहित दि ग्राम टुडे मासिक व साप्ताहिक ई पत्रिका के अलंकरण का कार्य।

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