साहित्य

माई के हाथ के बिनल सुइटर

वीणा पाण्डेय भारती

माई के हाथ के बिनल सुइटर
आ फुलगेना लागल टोपी
काजर पाउडर सभ लागल
गातीं बंधले लागी हम जोगी

दस्ताना अवरू मोजा शोभे
देखी – देखी अगराई
नमक तेल लपेटल रोटिया
काटी – काटी खा जाई

अंगुली पकड़ले देहरी तक माई
ले जाके पहुंचावस
दरवाजा के सिकड़ बजा के
बाबा आ चाचा के बोलावस

हाथ पकड़ हम बाबा के
दुअरा आ के बइठनी
तापत सभे आगी रहे
गोंदिया में हमहुं लुकइनी

सोना, मोना, रुपा अइली
खेले आंख मिचवनिया
बाबा के गोदिया से भगनी
मुसकी छुट्टे चवनिया

साझ ढलल रतिया अधियारी
दीया लेके खोजे सभे बारी – बारी
खेलल – कुदत जब हम अइनी
माई मिलेली रसोइया दुआरी

कौरे – कौरे मुंह में खियावस
चंदा मामा के गितिया सुनावस
सुनते सुनत हम कब सुत गइनी
उठनी भोरे जब उ उठावस

बचपन के दिनवा बहुते रहे निमन
पचपन के उमर में बहुते बा गिजन
रही – रही जाड़ावा ई अजबे सतावे,
रखी सावधानी कोरोना के बा सीजन ।

वीणा पाण्डेय भारती

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