साहित्य

माटी का दिया

नीरज कान्त सोती

मैं अँधेरी कोठरी का टिमटिमाता सा दिया हूँ ।
हूँ बहुत छोटा गहन तम से मगर भरसक लड़ा हूँ ।।
मैं अँधेरी कोठरी का ————

मानता हूँ है नहीं हस्ती दिवाकर सामने कुछ ।
किन्तु अँधियारा मिटाने के लिए जिद पर अड़ा हूँ ।।
मैं अँधेरी कोठरी का ————

छोड़ दूँ मैं आदमी को किस तरह अँधियार में ।
खेल कर जिस में पला वह, उसी माटी से बना हूँ ।।
मैं अँधेरी कोठरी का ————-

आग की लौ शीश पर रखता सदा सम्मान से ।
टूट कर ना बिखर जाऊँ इसलिए ही मैं तपा हूँ ।।
मैं अँधेरी कोठरी का ————-

है नहीं सौभाग्यशाली कोइ भी मुझ सा जहाँ में ।
आरती के लिए थाली में सदा मैं ही सजा हूँ ।।
मैं अँधेरी कोठरी का ————-

सूर्य की पहली किरण के साथ सब मुझको बुझाते ।
जबकि अँधियारा मिटाने साँझ से ही मैं जला हूँ ।।
मैं अँधेरी कोठरी का ————–
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स्वरचित-मौलिक रचना

नीरज कान्त सोती
बिजनौर, उत्तर प्रदेश ।

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