साहित्य

माता कैकेयी

राजेश श्रीवास्तव राज़


देवासुर संग्राम छिड़ गया भयंकर,
थल, नभ, जल हाहाकार हुआ।
खड़ग, बाणों के तीव्र टंकारों से,
चहुं ओर भीषण रक्तपात हुआ॥


देव, सुर, असुर नृप के शौर्य से,
सम्मुख- विमुख खुब युद्ध हुआ।
रथ पर राजा दशरथ संग आरूढ़,
सारथी कैकेयी का आगमन हुआ॥


बाण के संधान से जब उस युद्ध में,
नृप दशरथ वहां जब मूर्छित हुए।
पहिया निकले न रथ का कहीं यदि,
दो उंगली से कैकेयी ने थाम लिया।


सारथी कैकई ने अपनी बुद्धि से,
रण से पति को निकाल लिया।
नाथ की रक्षा हेतु उन्होने पल में,
प्राण संकट में अपना डाल दिया॥

जब बाली दशरथ का युद्ध हुआ,
उस बाली के आते ही सन्मुख।
दशरथ का बल सब क्षीण हुआ,
किरीट’ बाली नें था रख लिया॥

  ६
  दशकंधर बाली युद्ध हुआ जब,
   वह भी सम्मुख जब हार गया। 
   छल से ‘किरीट’ को लेकर रावण, 
    वापस लंका वह फिर भाग गया॥

      ७
    किरीट अयोध्या वापस लाने का, 
    रानी कैकेयी ने था संकल्प लिया। 
    वरदान लेकर उस माँ ने आखिर, 
    स्वयं पर कलंक का भार लिया॥  
     ८
     चौदह  वर्ष वनवास रहकर, 
     असुर संधान तो बहाना था। 
     माँ कैकेयी का मान यहाँपर,
     प्रभुराम से पूर्ण कराना था॥


     ९
   काल का वह दिवस जब आया,
   अंगद ने लंका में प्रवेश पाया। 
   ‘पग’ हिलाने लंकेश झुका जब,
   वह किरीट तब अंगद ने पाया॥ 
   १०
   प्रभुराम को ला वापस किया जब,
   अयोध्या का पुनः सम्मान आया। 
   लंकेश का समूल संहार करने का, 
   श्रेय सेना सहित प्रभुराम ने पाया॥ 

      ११
 वापस अयोध्या लौटे प्रभु जब,
 प्रथम ‘चरण रज’ कैकई का पाया। 
 कुमाता के कलंक से था उनको,
 मुक्त प्रभुवर ने अविलंब कराया॥

१२
धन्य धन्य है वह मातु कैकेयी,
जिसने था विषकलंक पान किया।
राष्ट्र के मान सम्मान हेतु जब,
यह कलंक अपने था माथ लिया॥

  १३
 युगों युगों तक ऐसी माता का,
 चरण वंदन है सहस्र बार यहाँ। 
 शौर्य,त्याग,बलिदान से जिसके,
 रघुकुल का नाम विख्यात हुआ॥  

१४
मानस के आदर्श प्रभुराम हुए,
आदर्श नगर अयोध्या धाम हुई।
माता कैकई के त्याग से देखो,
प्रभुराम ही मर्यादा के राम हुए॥

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