साहित्य

मिटी गरीबी धोती में

डॉ पुष्पलता

कटी गरीबी धोती में
हाय फटी गरीबी धोती में
सटी गरीबी धोती में
हाय चटीं गरीबी धोती में।

टुकुर -टुकुर झाँके सूई
और मुकर -मुकर ताके धागा
इधर लगाए जोड़ उधर से
कपड़ा निकल -निकल भागा
टकीं गरीबी धोती में
हाय डटी गरीबी धोती में।

अलमारी से निकल- निकलकर
बार -बार मचले ब्लाउज
कब से यूँ बेकार पड़ी हूँ
साड़ी भी करती आउच
बटीं अमीरी धोती में
हाय पटी गरीबी धोती में।

पहन खुशी इठलाई झटपट
सारी मेहनत निपटाई
मजदूरी में लिपटी जैसे
कोई रानी घर आई
काम बढ़ा इनाम घटाती
घटी गरीबी धोती में।

कुर्तों ने बांटी धोती तो
धक्के रेलम पेल हुई
छोड़ जिंदगी की गाड़ी
धोती अर्थी पर रेल हुई
मजदूरी पर मुस्काने धर
हटी गरीबी धोती में।

पाँच घरों को झाड़ा पोंछा
तीन घरों का पेट भरा
रेशा -रेशा तना खिंचा
फिर पैसा- पैसा खेंच धरा
बिन चाय , बिन पानी दौड़ी
खटी गरीबी धोती में।

उनकी लड़ियाँ जेवर साड़ी
बँगले में सजती गाड़ी
नवी नकोरी साड़ी खातिर
कई दिनों छत तक झाड़ी
तह लगा बिटिया हित राखी
मिटी गरीबी धोती में

डॉ पुष्पलता

मुजफ्फरनगर
मौलिक स्वरचित रचना

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