साहित्य

मिट्टी के दिए के कुछ शब्द

निवेदिता चक्रवर्ती


नि:संदेह मिट्टी से गढ़ा हूँ मैं

पर जिन अंधेरों तक तुम नहीं पहुँचते,
उन अंधेरों से लड़ता हूँ
जहाँ तुम्हारी सीमाएँ ख़त्म होती हैं,
वहाँ सफ़र शुरू करता हूँ

तिमिर सत्ता से नहीं डरा हूँ मैं
नि:संदेह मिट्टी से गढ़ा हूँ मैं

विनम्रता का मुखौटा चढ़ाए,
जगह – जगह ये अहंकारी घूम रहे हैं
भ्रांति-जालों को समझकर, अपनी-अपनी उपलब्धियां खूब चूम रहे हैं

प्रतियोगिता से दूर खड़ा हूँ मैं
नि:संदेह मिट्टी से गढ़ा हूँ मैं

मुझे गढ़ा है चाक पर घुमा – घुमा, धैर्य से प्यारे परिश्रमी हाथों ने
मेरे अस्तित्त्व को नहीं नकारा, कभी भी अंधेरे से भरी रातों ने

उत्ताल लहरों में ठहरा हूँ मैं
नि:संदेह मिट्टी से गढ़ा हूँ मैं

बूँद – बूँद तरलता को मैं मुझमें समाहित कर मौन एकत्रित करता हूँ
फिर साहस-अग्नि जला निराशा से ढंका
कोना- कोना प्रकाशित करता हूँ

अपनी ही धुन पर कुछ अड़ा हूँ मैं
नि:संदेह मिट्टी से गढ़ा हूँ मैं

~निवेदिता चक्रवर्ती
गुरुग्राम, हरियाणा

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