कवितासाहित्य

मुझको लगता है

मुझको लगता है कोई रूठा है बरसों से हमसे,
मुझको लगता है वो चाहता है मैं मना लूँ उसे,

मुझको लगता है दीवारे बड़ी है उस तक पहुंचने की,
मुझको लगता है वो आने न देगा मनाने के लिए उसे,

मुझको सांझ होने का रहता है इंतज़ार ,
चाँद तले बैठ कर मैं मना लूँ उसे,

मुझको लगता है कुछ कहना है उसे हमसे,
फ़िर लगता है बिन बोले ही मैं सुन लूँ उसे,

मुझको लगता है वो ख़ामोश बहुत,
रहती है मेरी कोशिश कि मना लूँ उसे,

सब्र दिन – ब – दिन घटता ही चला जाता है,
जब – जब सुनती हूँ ख़ामोश उसे,

वो रहता है हिज्र – ओ – दरियाँ में आजकल,
चाहता है कि मैं अकेला ही वहाँ रहने दूँ उसे,

वो सुने मुझे एक बार तो कह दूँ उसे,
जितना वो मुझे चाहता है उतना ही मैं भी उसे,

-मीरा पिंकी मिश्रा

सोनीपत, हरियाणा

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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