साहित्य

मुहब्बत तुमसे ही करता

शास्त्री सुरेन्द्र दुबे अनुज जौनपुरी

नहीं तुझसा कोई अपना,
तुम्ही इक हो मेरा सपना,
मकसद ए जिंदगी तुम हो,
मेरी जां तुम नहीं रूकना।।

जब भी तुम पास होती हो,
सकूं दिल को मेरे मिलता,
मोहब्बत के समंदर में,
मुस्कुराता कमल खिलता।।

न जाने कब कहां कैसे,
मोहब्बत हो गई तुमसे।
समझ में यह नहीं आता,
करूं इजहार मैं कैसे ।।

अब तो तेरे लिए जीना,
और तेरे लिए मरना।
कुबूल ए इश्क गर मेरा,
शुक्रिया जां मेरी कहना।।

अब तो शमशीर पर ,
रख दी है गर्दन,
जमाने से नहीं डरता।
सरेआम इकरार करता हूं,
मोहब्बत तुमसे ही करता।।

मोहब्बत तुमसे ही करता।।
मोहब्बत तुमसे ही करता।।

@काव्यमाला कसक

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