कवितासाहित्य

मेरा दिव्य ज्ञान

रिमझिम झा

माँ अगर धरती है मित्रों तो पिता है आसमां।
बस इन्हीं के चरणों में मिलता जन्नत आलीशान।।
जन्म दिया पाला पोषा दिया समय पर अक्षर का ज्ञान
पढ़ लिख कर हम बने अज्ञानी कर बैठे अभिमान
हमको तो सब कुछ आता है मैं कुछ भी करूं आपका क्या जाता है
हर बार किया सौ बार किया जी भर किया अपमान
माँ अगर धरती है मित्रों तो पिता है आसमान।
बस इन्हीं के चरणों में मिलता जन्नत आलीशान।।
पैसे खूब कमाए, कमाया यश शोहरत नाम
जिनकी बदौलत यह सब था लिया ना कभी उनका नाम
अज्ञानी बनकर जिसके डाल पर झूल रहे थे
किया न कभी उस जड़ का मान।
यह धरा विधाता की रचना है भुली बैठी थी आ रही विपदा का न था तनिक भी भान
मां अगर धरती है मित्रों तो पिता है आसमान। बस उन्हीं के चरणों में मिलता जन्नत आलीशान।।
जब अपनी संतान ने इतिहास दोहराया
तब खुली चक्षु मिला आत्मज्ञान
जैसा बोया है वैसा ही पाओगे
समय रहते चेत जाओ वरना तुम केवल पछताओगे
मात-पिता ही दुनिया है, वही है भगवान
उनकी महिमा से ही जीवन है।
ठोकर खाकर मिल गया मुझे भी दिव्य ज्ञान।।
मां अगर धरती है मित्रों.पिता है आसमां।
बस..इन्हीं के चरणों मेंं मिलता जन्नत आलीशान..।।
रिमझिम झा, कटक ओडिशा
rimjhimjha831@gmail.com

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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