कवितासाहित्य

मेरी खिड़की के सम्मुख उसकी खिड़की है

__अ कीर्ति वर्द्धन

मेरी खिड़की के सम्मुख उसकी खिड़की है,
सूरज की पहली किरणों से जो खुलती है।
दिन भर की उर्जा पल में मुझको मिल जाती,
खिड़की से जब मुझको वो देखा करती है।

अब तो मैं भी राह निहारूं, कब आयेगी,
बारिश की बूंदें होंगीं, वह छत पर जायेगी।
भूल गया हूं खाना पीना, तन्हां राह निहारूं,
बिस्तर पर जल्दी जाता, ख्वाबों में आयेगी।

कभी कभी वह खिली धूप सी, खिड़की में आ जाती,
कभी चहकती चिड़िया जैसी, उसकी बातें सुन जाती।
घिरी घटा सी कभी दिखती, वह नीले नीले नभ में,
जब भीगे बालों को सुलझाती, मुझको वह दिख जाती।

कैसे उससे बात करूं, मैं अक्सर सोचा करता,
चाहत का इजहार करूं, मैं अक्सर सोचा करता।
व्याकुलता बढ़ती जाती थी, सोच सोच कर उसको,
कब कैसे हो प्रणय निवेदन, मैं अक्सर सोचा करता।

टूटी डाल कोई आंधी से, जैसे दूर चली गई,
मर्यादाओं में बंधी हुई, वैसे ही वह छली गई।
धड़कन को भूलूं कैसे, दिल को कैसे समझाऊं,
नागफनी उग आये मन में, जब से मेरी कली गई।

अ कीर्ति वर्द्धन

50% LikesVS
50% Dislikes

कुमार संदीप

अध्यापक सह लेखक । निवास स्थान- सिमरा(मुजफ्फरपुर) बिहार । विभिन्न साहित्यक पत्र पत्रिकाओं में निरंतर रचना प्रकाशन । कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित । वर्तमान में ग्रामीण परिवेश में अध्यापन कार्य सहित दि ग्राम टुडे मासिक व साप्ताहिक ई पत्रिका के अलंकरण का कार्य।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button
error: Content is protected !!