साहित्य

मेरी राह में बरसते थे

वो मेरे माथे पे आई शिकन समझते थे,
दूर रहकर भी मेरा हौसला वो बनते थे।

तेज धूप झुलसाती थी जब पाँव मेरा,
बन के बादल वो मेरी राह में बरसते थे।

रोक लेती हूँ बहने से अपने आँसू को,
वो मेरी मुस्कुराहट पे जान छिड़कते थे।

बहुत है नाम मेरा लोग आकर कहते हैं,
एक नाम ही भाया जो हमको कहते थे।

इस जहाँ में हरेक शख्स रंग बदलता है,
नहीं उतरा मेरे तन पर जो रंग लगते थे।

एक दुनिया बसा रखी थी संग यादों के,
उनके पहलू में मेरे रात दिन गुजरते थे।

वो साथ हों तो जन्नत नहीं माँगूँ रब से,
जमीं पे उतरे हुए वो भी इक फरिश्ते थे।

थक के सोने के लिए सेज न चाहा हमनें,
दिल की धड़कनों में लोरियों को सुनते थे।

नीलम द्विवेदी
रायपुर, छत्तीसगढ़।

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