कवितासाहित्य

मेरे गांव के लड़के

_संजय स्वामी

निकले किसी गली से तो खिड़कियां इन्हे झांकती है।
ना निकले तो गलियां भी इनको ताकती है।।
रोनकें हैं इनसे, और इन्होंने गांव को संवारा बहुत है।
मेरे गांव के लड़के आवारा बहुत है।।

बात बात पर झगडे़, हृष्ट-पुष्ट और तगड़े।
अगर ले ले कोई पंगा तो बीच बाजार में रगड़े।।
किसी का मन चंचल, तो किसी का कुंवारा बहुत है।
मेरे गांव के लड़के आवारा बहुत है।।।

सुख दुख में काम आते, बिना बुलाए शादी में जाते।
ईद हो या होली-दीवाली, मिलझुल कर सब साथ मनाते।।
मां-बाप भी यह सबके कहते, हमारे लड़के नाकारा बहुत है।
मेरे गांव के लड़के आवारा बहुत है।।

लालच नहीं कुछ पाने का, जुनून है कुछ कर दिखाने का।
कुछ गांव से निकले किसी ने पढ़ने का बहाना लिया तो किसी ने कमाने का।।
मेहनती तो बहुत है, पर किस्मत ने इनको धिकारा बहुत है।
मेरे गांव के लड़के आवारा बहुत है।।

संजय स्वामी
पूगल ,बीकानेर ,राजस्थान

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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