कवितासाहित्य

मेरे गिरने पर हंस क्यों रहे हो

__डा.रमेश कटरिया पारस ग्वालियर

मेरे गिरने पर हंस क्यों रहे हो
क्या मैं ही अकेला गिरा हूं क्या

मुझसे पहले कोई नहीं गिरा था
कई लोग रोज़ गिरते हैं
उन्हे देखकर तुम कभी नहीं हंसते हो

क्योंकि वे तुमसे ज्यादा बलवान हैं
तुम हमेशा कमजोर को गिरा हुआ देखकर ही हंसते हो

मुझसे भी ज्यादा गिरे हुए लोग हैं

जो दूसरों को गिराने में ही लगे रहते हैं
वे उनको गिरा कर ही ऊंचे उठते हैं
ये दुनियां का दस्तूर है

यदि तुम्हे ऊंचा उठना है तो अपने प्रतिद्वंदी को नीचे गिरानें के जतन करते रहो
एक दिन तुम भी बहुत ऊंचे उठ जाओगे सब की नजरों में

लेकिन अपनी नजरों में तुम भी गिर जाओगे बहुत नीचे

डा.रमेश कटरिया पारस ग्वालियर

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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