साहित्य

मैं एक आम आदमी हूँ

अतुल कुमार

आज खुद को चींख कर
आवाज देने को मन करता है,
दबा हूँ ,दूसरों की खुशियों तले
फिर खड़े होने को मन करता है।।

दूसरे जो बोते हैं काँटे राह में
बस उन्हें निकालने में लगा रहता हूँ मैं
सोचता हूँ, काँटे बिछा दूँ उनकी राह में
फिरभी फूल बिछाने में लगा रहता हूँ मैं।।

पतंग की तरह बन गया हूँ,
डोर खिंचवाने में लगा रहता हूँ मैं,
खुद की कोई मंजिल नही मेरी,बस
दूसरों को मंजिल पँहुचाता रहा हूँ मैं।।

खुद के लिए वक्त न पास मेरे
बस दूसरों पर वक्त लुटाता रहा हूँ मैं,
सब उड़ रहे हैं परिंदे बन गगन में
बस उनके लिए घोंसले बनाता रहा हूँ मैं।।

जब मेरे अपनो की जीत न हो
हार का जिम्मेवार बनता रहा हूँ मैं,
पर जब भी आते हैं जीत कर वो
अपने नाम को छुपाता रहा हूँ मै।।

मैं एक आम आदमी हूँ,
अपनो के लिए घिसता रहा हूँ मै,
खो चुका हूँ वजूद अपना,
बस सबके लिए पिसता रहा हूँ मैं।।

               अतुल कुमार, गड़खल
                     जिला सोलन।।
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