कवितासाहित्य

मैं और मेरी मंज़िल

मुझे लगता है जैसे मेरा कोई नहीं
की मुझे अकेलापन बहुत सताता है
ये एकांत तक का सफ़र,
शायद मुझे नहीं भाता है
अब कोई अपना नहीं लगता मुझे
बस हर कोई पराया-पराया सा नज़र आता है।

हाँ, अब मंज़िल की तो बहुत तलब है मुझे
की मेहनत करने से अब मन नहीं कतराता है
बदल गई हूँ, उस पुराने रूप से मैं,
की मुझे अब इस सफ़र में
सफल होने का पल नज़र आता है।

छोड़ दिया है मैने सब कुछ अब
की अब मंज़िल को, अपने गले से लगाना है
बार बार नहीं, इस बार शुरुआत से ही
एक बार में ही कर के जाना है।

-Savia

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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